चाणक्य नीति के अनुसार पारिवारिक सुख क्या है
चाणक्य नीति एक अमूल्य ग्रंथ है, जिसमे व्यक्ति के जीवन में आने वाली दिक्कतों बड़ा अच्छा समाधान किया है। चाणक्य नीति में पारिवारिक सुख के बारे में कहा है कि
जिसके पुत्र और पुत्री अच्छी बुद्धि वाले हो, जिसकी पत्नी मीठा बोलने वाली हो, जिसके पास परिश्रम और इमानदारी से पैदा किया हुआ धन हो, जिसकेे अच्छे मित्र हो, जिसका अपने पत्नी के प्रति प्रेम और अनुराग हो , नौकर चाकर आज्ञा का पालन करने वाले हो, जिस घर में अतिथियों का स्वागत सम्मान होता हो कल्याणकारी परमेश्वर की उपासना होती हो घर में प्रतिदिन अच्छा मीठे भोजन और मधुर पेय पदार्थ की व्यवस्था हो, सज्जन लोगो का संघ अथवा संगति करने का अवसर मिलता हो ऐसा गृहस्थ आश्रम धन्य है और प्रशंसा के योग्य है
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी। विभवे यश्च सन्तुष्टस्तस्य स्वर्ग इहैव हि।।
प्रत्येक व्यक्ति इस संसार में सुखी रहना चाहता है यही तो स्वर्ग है। स्वर्ग में भी सभी प्रकार के सुखों का उपभोग करने की कल्पना की गई है इस बारे में चाणक्य कहते हैं। जिसका पुत्र उसकी बात मानता है। जिसकी पत्नी उसकी ईच्छा के अनुसार कार्य करती है। जो अपने कमाए हुए धन से संतुष्ट है ज्यादा कमाने की इच्छा तो है, लेकिन कोई लालच नहीं है। ऐसे मनुष्य के लिए किसी अन्य प्रकार के स्वर्ग की कल्पना व्यर्थ है ।😗
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चाणक्य ने अन्य श्लोक में कहा है कि भोजन के लिए अच्छी पदार्थ का होना उसे खाकर पचाने की शक्ति होना, सुंदर स्त्री का मिलन और उसके उपभोग के लिए काम शक्ति का होना। धन के साथ-साथ उसे दान देने की इच्छा होना। यह बातें मनुष्य को किसी महान तप के कारण प्राप्त होती है।
भोजन में अच्छी वस्तुओ की कल्पना है सभी करते हैं परंतु वस्तुएं प्राप्त होना और उसे पचाने की शक्ति होना भी आवश्यक है प्रत्येक पर प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसे सुंदर स्त्री मिले लेकिन उसके उपभोग के लिए व्यक्ति में काम शक्ति भी होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है किसके पास धन हो लेकिन धन प्राप्ति के बाद कितने ऐसे लोग हैं जो उसका सदुपयोग कर पाते हैं। अच्छी जीवनसंगिनी, अच्छी शारीरिक शक्ति, धन और वक्त जरूरत पर किसी के काम आने की प्रवृत्ति आदि पूर्व जन्मों के कर्मों का फल होता है।
जो व्यक्ति धन धन के लेनदेन में विद्या अथवा किसी कला के सीखने में भोजन के समय अथवा व्यवहार में लज्जा हीन होता है अर्थात संकोच नहीं करता है वह सुखी रहता है।
व्यक्ति को लेनदेन में किसी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिए अपनी बात स्पष्ट शब्दों में कहने चाहिए विद्या अथवा किसी गुण को सीखने में संकोच नहीं करना चाहिए इससे हानि होती है। इसी प्रकार भोजन करते समय जो व्यक्ति संकोच करता है और भूखा रह जाता है इसलिए भोजन के समय , लोकचार और व्यवहार के समय व्यक्ति को संकोच ना करके अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त करने चाहिए।
जो व्यक्ति संतोष रूपी अमृत से सख्त है मन मन से शांत है उसे जो सुख प्राप्त होता है वह धन के लिए इधर-उधर दौड़-धूप करने वालों को भी कभी प्राप्त नहीं होता है संतोष की बड़ी महिमा है जो व्यक्ति संतोष के कारण अपना जीवन व्यतीत करते हैं और शांत रहते हैं उन्हें जितना सुख प्राप्त होता है वह धन के लालच के लिए हर समय दो टूक करने वाले व्यक्ति को प्राप्त नहीं हो सकता है।
चाणक्य नीति के अनुसार अपना जीवनसाथी किसे और कैसे चुने
नीति का शाब्दिक अर्थ है जो आगे ले जाए।
जिस प्रकार विज्ञान के सिद्धांत की पुष्टि विभिन्न मापदंडों पर एक समान रहने पर की जाती है। उसी तरह जीवन में नीति की पुष्टि विभिन्न मापदंडों पर एक समान रहने पर की जाती है।
आचार्य चाणक्य ने नीति शास्त्र को विज्ञान कहा है। अब आप सोच रहे होंगे कि 2500 वर्ष पूर्व लिखी गई नीतियां आज भी वही परिणाम दे सकती है। जबकि दोनो समय के रहन सहन में बहुत परिवर्तन आ चुका है। तो ये नीतियां समय काल से प्रभावित नहीं होती और आज भी आपको जीवन में सफल बनाने में सक्षम है।
आचार्य ने लिखा है कि राजनीति में कभी कभी ऐसे कदम उठाने पड़ते है जो नीति विरुद्ध लगते है। इसके लिए आपको उस कदम के लाभ के बारे में सोचना चाहिए। अगर आपके कदम से जन कल्याण होता हो वो कदम नीति विरुद्ध होते हुए भी सही है। जैसे की महाभारत में युधिष्ठिर ने द्रोणाचार्य बध के समय की थी। उस समय नीति के ज्ञाता श्री कृष्ण ने इस कदम को सही बताया था।
अर्थ
बुद्धिमान व्यक्ति को अच्छे कुल में जन्म लेने वाली कुरूप स्त्री से भी विवाह कर लेना चाहिए। जबकि अच्छे रूप वाली नीच जन्म लेने वाली स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए।
व्याख्या
आचार्य के अनुसार व्यक्ति के जीवन में विवाह एक बहुत महत्वपूर्ण घटना है। इसीलिए व्यक्ति को अपना विवाह बहुत सोच समझ कर करना चाहिए। विवाह का निर्णय जल्दबाजी में नहीं चाहिए।
आचार्य के अनुसार शरीर की बाहरी सुंदरता सिर्फ दिखावा मात्र है। जीवन साथी भले ही कुरूप हो लेकिन अच्छे गुणों वाला व्यक्ति को जीवन साथी को चुनना चाहिए। और ये देखना चाहिए कि आप उस व्यक्ति के साथ अपना पूरा जीवन गुजार पाएंगे। जबकि जीवन साथी सुंदर हो लेकिन अच्छे गुण वाला न हो उसे नही चुनना चाहिए।
आचार्य ने अन्य श्लोक में लिखा है कि जिस प्रकार सुनार सोने को घिसकर, तपाकर, काटकर और कूटकर परीक्षा लेता है। उसी प्रकार मनुष्य की परीक्षा की जानी चाहिए।
वैसे तो आचार्य में यह श्लोक पुरुषो के लिए लिखा है लेकिन यह बात महिलाओ पर भी लागू होती है। क्योंकि अन्य श्लोक में आचार्य ने कन्या के पिता से भी कहा है कि कन्या का विवाह अच्छे कुल के पुरुष के साथ करना चाहिए। ये 2500 साल पुरानी बात है वर्तमान में कन्या भी अपने जीवन साथी का चुनाव करती है इसीलिए कन्या को भी जीवन साथी में सुंदरता न देख कर अच्छे गुण को देखना चाहिए।
लेकिन सौभाग्य से अगर आपको ऐसा जीवन साथी मिल जाता है जो अच्छे गुणों के साथ सुंदर भीं है। तो ये आपके पूर्व के जन्मों के अच्छे कर्मों का फल है। जितनी जल्दी हो ऐसे व्यक्ति से विवाह कर ले।
नमस्कार साथियों, आपका स्वागत है life Lessons के मध्यम से अपने जीवन को सफल और सुगम बनाने वाले अपने अभियान में।
जीवन साथी का हमारे जीवन में क्या महत्व इस बारे में किसी को कुछ भी बताना व्यर्थ है। हम सभी अच्छे जीवन साथी के महत्व को जानते है। सावित्री जैसी पत्नी यमराज के चंगुल से भी अपने पति को मुक्त करवा सकती है। इसीलिए साथियों आज हम चर्चा करेंगे कि चाणक्य नीति में आदर्श पत्नी की क्या क्या विशेषता बताई है। चलिए आज इसी विषय पर चर्चा प्रारंभ करते है।
इस संसार में ज्यादातर लोग दुखी है। चाणक्य नीति में आचार्य चाणक्य में दुखी व्यक्तियों के लिए शांति का उपाय बताया है।
चाणक्य नीति के अध्याय 4 श्लोक 10 के अनुसार इस संसार में दुखी लोगो को तीन बातो से ही शांति हो सकती है—अच्छी संतान, पतिव्रता पत्नी और सज्जन का संग।
अर्थात चाणक्य नीति के अनुसार 3 चीजे दुखी जीवन को सुख प्रदान कर सकती है। वह है अच्छी।संतान, पतिव्रता पत्नी और सज्जन लोगो का संग।
अन्य बातो के बारे में चर्चा हम दूसरे वीडियो में करेंगे आज हम पतिव्रता पत्नी के बारे में बात करेंगे। पतिव्रता पत्नी का जीवन पति के जीवन कों सवर्ग बना देती है और दुष्ट स्त्री पति के जीवन को नर्क बना देती है। यह बात चाणक्य नीति के इस श्लोक से स्पष्ट हो जाती है।
चाणक्य नीति के अध्याय 6 श्लोक 12 के अनुसार बुरे राज्य की अपेक्षा किसी प्रकार का राज्य न होना अच्छा है। दुष्ट मित्र के अपेक्षा मित्र न होना अच्छा है। दुष्ट शिष्यों की अपेक्षा शिष्य न होना अच्छा है। और दुष्ट पत्नी का पति होने से अच्छा है पत्नी ही न हो।
अर्थात व्यक्ति का दुष्ट पत्नी से विवाह करने से अच्छा है कि।व्यक्ति आजीवन कुंवारा ही रहे है। या दुर्भाग्य वश किसी व्यक्ति का विवाह दुष्ट जीवन साथी से हो जाता है तो दुष्ट जीवन साथी का साथ छोड़ देना चाहिए। क्योंकि अच्छा जीवन साथी ही आपका सच्चा मित्र होता है।
चाणक्य नीति के अध्याय 5 श्लोक 15 के अनुसार विदेश में विद्या ही मनुष्य की सबसे सच्ची मित्र होती है। घर में अच्छे स्वभाव वाली और गुणवती पत्नी ही मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती है। रोगी व्यक्ति की दवाई मित्र है और जो मनुष्य मर गया होता है धर्म कर्म ही उसका मित्र होता है।
जैसा कि इस श्लोक में बताया है कि कब और कौन अच्छा मित्र होता है
विदेश में विद्या ही मनुष्य की सबसे सच्ची मित्र होती है।
घर में अच्छे स्वभाव वाली और गुणवती पत्नी ही मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती है।
रोगी व्यक्ति की दवाई मित्र है
और जो मनुष्य मर गया होता है धर्म कर्म ही उसका मित्र होता है।
बाकि।बातो।की बात हम अन्य वीडियो में।करेंगे आज हम अच्छे स्वभाव और गुणवती पत्नी के बारे में बात करेंगे। अच्छे स्वभाव वाली और गुणों।से युक्त पत्नी ही व्यक्ति की सबसे अच्छी।मित्र होती है। आइए बात करते है कि चाणक्य नीति में अच्छे स्वभाव और गुणवान पत्नी के बारे में।क्या बताया।गया है।
चाणक्य नीति के अध्याय 4 श्लोक 13 के अनुसार पति के लिए वही पत्नी उपयुक्त होती है, जो मन, वचन और कर्म से एक जैसी हो और अपने कार्यों में निपुण हो, इसके साथ ही वह अपने पति से प्रेम रखने वाली तथा सत्य बोलने वाली होनी चाहिए ऐसी स्त्री को ही श्रेष्ठ पत्नी माना जा सकता है।
अर्थात चाणक्य नीति की अनुसार एक आदर्श पत्नी में ये गुण होने चाहिए
मन कर्म और वचन में एकरूपता - अर्थात आदर्श पत्नी जैसा सोचे वैसा बोले और उसी के अनुसार अपने कर्म करने चाहिए। पत्नी के कर्म परिवार की उन्नति करने वाले होने चाहिए।
कार्य में निपुण- आदर्श पत्नी अपने कार्य में निपुण होनी चाहिए। एक पत्नी को अनेकों।कार्य करने होते है वह एक अच्छे कुक से लेकर एक अच्छी अध्यापिका तक बहुत सारे कार्य कार्य करने होते है। आदर्श पत्नी को चाहिए की वह सभी कार्यों में निपुणता प्राप्त कर ले। और अपनी कार्य कुशलता से अपने परिवार को।प्रसन्न कर दे।
पति से प्रेम - प्रेम पति और पत्नी के रिश्ते के बीच मजबूत कड़ी के रूप में कार्य करता है। अक्सर प्रेम ही पति और पत्नी के बीच में तलाक का कारण बनता है। इसीलिए पत्नी।को चाहिए कि वह अपने प्रेम से अपने पति को संतुष्ट कर दे।
सत्य वचन - आदर्श पत्नी को कभीं झूठ नही बोलना चाहिए। क्योंकि झूठ जब पकड़ा जाता है तो पति पत्नी के रिश्ते को कमजोर कर देता है। आदर्श पत्नी को चाहिए कि वह अपने पति से सदा सत्य बोले।
दूसरी नीति
दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायक:।
स-सर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशय:।।
इस श्लोक के अनुसार यदि कोई स्त्री दुष्ट स्वभाव वाली है, हमेशा कठोर वचन बोलने वाली है, चरित्रहीन है तो उसे छोड़ देना चाहिए या उससे दूर हो जाना चाहिए। इसी प्रकार किसी नीच व्यक्ति से भी किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखना चाहिए। जो नौकर अपने मालिक का आदेश नहीं मानता हो उसे कार्य से मुक्त कर देना चाहिए और जिस घर के आसपास सांप रहते हों वहां नहीं रहना चाहिए। जो भी व्यक्ति इन बातों का पालन नहीं करता है उसे मृत्यु के समान कष्ट भोगने पड़ते हैं।
तीसरी नीति
आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान् रक्षेद्धनैरपि।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि।।
इस श्लोक के अनुसार किसी भी श्रेष्ठ पुरुष को आपत्तिकाल के लिए धन बचाकर रखना चाहिए।
धन से भी अधिक अपनी पत्नी की रक्षा करनी चाहिए
और पत्नी से भी ज्यादा स्वयं की रक्षा करनी चाहिए,
क्योंकि पति सुरक्षित रहेगा तभी उसका परिवार भी सुरक्षित रहेगा।
॥चौथी नीति
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी।
विभवे यश्च सन्तुष्टस्तस्य स्वर्ग इहैव हि।।
आचार्य कहते हैं कि किसी पुरुष का पुत्र आज्ञाकारी हो और पत्नी वश में हो तथा धन की कोई कमी न हो तो उसका जीवन किसी स्वर्ग के समान ही है।
जानीयात्प्रेषणे भृत्यान्बान्धवान् व्यसनागमे ।
मित्रं चापत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥ (१/११) ॥
भावार्थ:-
नौकर की परीक्षा तब करें जब वह कर्त्तव्य का पालन न कर रहा हो, रिश्तेदार की परीक्षा तब करें जब आप मुसीबत मे घिरें हों,मित्र की परीक्षा विपरीत परिस्थितियों मे करें,और जब आपका वक्त अच्छा न चल रहा हो तब पत्नी की परीक्षा करे।
आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसण्कटे। राजद्वारे श्मशाने च यात्तिष्ठति स बान्धवः ॥
(Chanakya Neeti)
Meaning: जब कोई बीमार होने पर, असमय शत्रु से घिर जाने पर, राजकार्य में सहायक रूप में तथा मृत्यु पर श्मशान भूमि में ले जाने वाला व्यक्ति सच्चा मित्र और बन्धु है ।
वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम्।
रूपवतीं न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥१४॥
भावार्थ – बुद्धिमान व्यक्ति को श्रेष्ठ कुल की कन्या से ही विवाह करना चाहिए। उसे सौन्दर्य के पीछे नहीं भागना चाहिए। कुलीन कन्या का रंग-रूप भले ही सामान्य हो, किन्तु व्यक्ति को अपना सम्बन्ध कुलीन घराने की कन्या से ही करना चाहिए। इसके विपरीत नीच कुल की सुन्दर कन्या से केवल उसका रूप देखकर विवाह करना उचित नहीं।
नखीनां च नदीनां च शृङ्गीणां शस्त्रपाणिनाम्।
विश्वासो नैव कर्त्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥१५॥
भावार्थ – नाखून वाले हिंसक पशुओं, नदियों, सींग वाले पशुओं, शस्त्रधारियों, स्त्रियों एवं राजकुलों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि काञ्चनम्।
नीचादप्यत्तमा विद्या स्त्रीरत्नं दष्कलादपि ॥१६॥
भावार्थ – चाणाक्य नीति बतलाती है कि विष में से अमृत को, अशुद्ध पदार्थों में से सोने को, नीच मनुष्यों में से उत्तम विद्या को, दुष्ट कुल से स्त्री रत्न को ले लेना चाहिए।
स्त्रीणां द्विगुण आहारो बुद्धिस्तासां चतुर्गुणा।
साहसं षड्गुणं चैव कामोऽष्टगुण उच्यते॥१७॥
भावार्थ – स्त्रियों का आहार पुरुषों की अपेक्षा दो गुना, बुद्धि चार गुना, साहस छः गुना और काम वासना आठ गुना अधिक होती है।
अध्याय 1 पूर्ण
