जय श्री कृष्णा, आशा है आप सभी कुशल मंगल से होंगे आज की वीडियो में हम चर्चा करेंगे किoo(nn i kn i भगवद गीता में ऐसे कौन से oशत्रु बताए है जो हमारे भीतर रहते है और हमाiरे सुख को धीरे धीरे खत्म कर देते है। साथ ही हम यह भी जानेंगे कि कैसे हम अपने अंदर के शत्रुओं को हरा कर समाप्त कर सकते है तो आइए आज की वीडियो पर चर्चा प्रारंभ करते है।
काम
क्रोध
लोभ
मोह
अहंकार
इर्ष्या
अगर हम अपने अंदर के इन शत्रुओं को समाप्त कर देते है तो हमारा जीवन सुखमय हो जाता है। ये शत्रु हमारी इंद्रियों से जन्म लेते है इसीलिए अपने अंदर के शत्रुओं को समाप्त करने के लिए सबसे पहले हमे अपनी इंद्रियों पर वश करना होगा। अपने इंद्रियों को अपने वश में किए बिना मनुष्य को सुख नहीं मिल सकता है।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।2.66।।
अर्थ:-जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ उसके वश में नहीं होती उसकी न तो बुद्धि स्थिर होती है, न मन स्थिर होता है और न ही उसे शान्ति प्राप्त होती है, उस शान्ति-रहित मनुष्य को सुख मिलना किस प्रकार संभव है?
इस श्लोक के अनुसार जिनकी इंद्रियां उनके मन के वश में नहीं है उसे न तो शांति मिल सकती है और जब शांति नहीं मिलती तो सुख कैसे मिल सकता है। मानसिक शांति और सुख के लिए अपनी इंद्रियों को वश में करना बहुत आवश्यक है।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.61।।
अर्थ:- इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति।।2.71।।
अर्थ:- वह व्यक्ति, जो समस्त भौतिक इच्छाओं को त्याग देता है। वह मनुष्य लोभ, स्वामित्व तथा अहंकार की भावना से मुक्त रहता है, पूर्ण शांति प्राप्त करता है।
इन दोनो श्लोक के अनुसार जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को अपने वश में कर लेता है और अपनी सभी कामनाओं को त्याग देता है उसे मानसिक शांति और सुख मिलता है। लेकिन अपनी इंद्रियों को वश में करना बहुत कठिन है क्योंकि हमारा मन बहुत चंचल है
श्री भगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।6.35।।
Meaning:- The Blessed Lord said O mighty-armed one, undoubtedly the mind is untractable and restless. But, O son of Kunti, it is brought under control through practice and detachment.
अर्थ:- श्रीभगवान् बोले -- हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! जो तुमने कहा वह सत्य है, मन को नियंत्रित करना वास्तव में कठिन है। किन्तु अभ्यास और विरक्ति द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
इस श्लोक के अनुसार हमारा मन बहुत चंचल है लेकिन अभ्यास और वैराग्य से अपने मन को वश में किया जा सकता है जब मन वश में होगा तो इंद्रियां अपने आप वश में आ जाएंगे। इंद्रियां वश में होंगी तो किसी चीज की लालसा नहीं होगी। जब लालसा नहीं होगी तो बहुत मानसिक शांति मिलेगी और फिर मानसिक शांति से मानसिक सुख प्राप्त होगा।
साथियों इसी के साथ आज की चर्चा यही समाप्त होती है। आज की चर्चा में सामिल होने के लिए आप सभी का धन्यवाद। वीडियो अच्छी लगी हो तो वीडियो को लाईक करे शेयर करे। आगे की वीडियो में अपने अंदर के शत्रुओं और उन्हे सामना करने के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे इसीलिए अगर आप हमारे चैनल पर पहली बार आए है तो हमारे चैनल को subscribe करके हमारे साथ जुड़ जाइए। जल्द ही मिलते है इसी तरह की दूसरी वीडियो पर, तब तक के लिए राधे राधे
2nd video
जय श्री कृष्णा साथियों, आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं भगवान आप सभी साथियों पर अपना आशीर्वाद और प्रेम हमेशा बनाए रखे आज की वीडियो में हम चर्चा करेंगे कि भगवद गीता में ऐसे कौन से तीन शत्रु है जो नर्क के दरवाजे के समान बताए गए है जो हमारे भीतर रहते रहते हमारी आत्मा को भी नष्ट कर देते है। साथ ही हम यह भी जानेंगे कि कैसे हम अपने अंदर के इन शत्रुओं को हरा कर समाप्त कर सकते है जिससे हम नर्क जाने से बच जाए तो आइए आज की वीडियो पर चर्चा प्रारंभ करते है।
साथियों पिछली वीडियो में हमने अपने शरीर के भीतर रहने वाले 6 शत्रुओं पर चर्चा की थी। आज उन्ही 6 शत्रुओं में से 3 ऐसे शत्रुओं पर चर्चा करेंगे जिन्हे swam भगवान श्री कृष्ण ने नर्क के दरवाजे के समान कहा है।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।16.21।।
अर्थ:- काम, क्रोध और लोभ -- ये तीन प्रकारके नरक के दरवाजे जीवात्मा का पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनों का त्याग कर देना चाहिये।
इस श्लोक के अनुसार उन 6 शत्रुओं में से ये तीन शत्रु सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि ये शत्रु सीधी तरह से नर्क का रास्ता दिखाने वाले है व्यक्ति की आत्मा को मारने वाले है इसीलिए इन तीन शत्रुओं पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इनका त्याग कर देना चाहिए। ये शत्रु है
काम
क्रोध
लोभ
आइए इन अब इन तीन शत्रुओं पर बारी बारी से चर्चा करते है
काम - हमारे मस्तिष्क का सबसे बड़ा शत्रु है काम। काम से आशय सिर्फ काम वासना से नही बल्कि काम के अंदर हमारी ऐसी सभी इच्छाएं शामिल है जिसे पूरा करने के लिए हम किसी भी हद तक जा सकते हो। कई बार हमें कुछ चीजों की आदत भी लग जाती है हम चाह कर भी उन चीजों को छोड़ नहीं पाते इन आदतों को भी काम में ही शामिल किया जाता है। काम के वश में आकर मनुष्य सभी रिश्ते नातों को भूलने लगता है। काम की तुलना आप एक शराबी से कर सकते है। शराबी में जब अल्कोहल की तलब होती है तो उसका एक अल्कोहल उसके लिए वह क्या क्या तरीका अपनाता है यह वह भी नहीं सोच पाता । फिर अच्छे या बुरे किसी भी तरीके से वह अपनी काम को मिटाने की कोशिश करने लगता है। इस तरह देखा जाए तो काम का मतलब किसी भी चीज की लत हो सकती है जैसे नशे की, पैसे की, पावर की या फिर शारीरिक शक्ति की। कुल मिलाकर जब हम किसी भी चीज को पाने के लिए हम अपने परिवार, दोस्त और अपना और अपने परिवार का मान सम्मान इन सबको दर किनार कर दे यही भी काम है। हम मनुष्य के अंदर 6 महत्वपूर्ण दोष होते हैं इन दोषों में काम को सबसे ऊपर रखा गया है। कुछ लोगों में काम की मात्रा ज्यादा होती है और कुछ लोगो में कम । कुछ लोगो में सफलता प्राप्त करने की बहुत ज्यादा क्रेविंग होती है जिसके लिए वह अच्छे बुरे का ध्यान नहीं रखते । सभी रिस्तो को भूल जाते है इसे भी काम की श्रेणी में रख सकते है। इसीलिए सफल होना अच्छी बात है मगर सफल होने के लिए आप क्या-क्या तरीके अपनाते हैं इस पर भी गौर किया जाना चाहिए। अपने काम की लालसा को संतुष्ट करने के लिए किसी दूसरे का नुकसान नही करना चाहिए। काम की लालसा हमारी इंद्रियों का भटका देती है जिससे हमे अच्छे बुरे का ध्यान नहीं रहता
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।2.60।।
अर्थ:- हे कौन्तेय (संयम का) प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान (विपश्चित) पुरुष के भी मन को ये इन्द्रियां बलपूर्वक हर लेती हैं।।
इस श्लोक के अनुसार काम की लालसा मनुष्य की इंद्रियों को भटका देती है इसीलिए मनुष्य को अपनी इंद्रियों को वश में करने के लिए समुंद्र की शांत चित्त का होना चाहिए
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2.70।।
अर्थ:- जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में अनेक नदियों के जल उसे विचलित किये बिना उसमे समा जाते हैं। वैसे ही पुरुष के कामनाओं के विषय उसमें विकार उत्पन्न किये बिना समा जाते हैं। ऐसा पुरुष ही शान्ति प्राप्त करता है।
इस श्लोक के अनुसार मनुष्य का मन ऐसा है कि मनुष्य के मन में काम की लालसा तो आयेगी ही आयेगी। इससे देवता भी कामनावो से बच नहीं सकते इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि वह इन सभी कामनाओं को अपने अंदर ही दबा दे। इससे मनुष्य अपनी जीवन यात्रा में शांति प्राप्त कर पाएगा।
क्रोध - मनुष्य का दूसरा सबसे बड़ा शत्रु है क्रोध क्रोध यानी गुस्सा। गुस्सा तो हम सभी को आता है मगर थोड़े बहुत गुस्से के बाद अगर हम उसे कंट्रोल कर ले तो वह हमारे दिमाग पर हावी नहीं हो पाता। मगर जब ऐसा नहीं होता तो क्रोध हमारा सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है वैसे देखा जाए तो क्रोध भी काम से जुड़ा हुआ है जब भी हमारी कोई इच्छा पूरी नहीं हो पाती या कोई काम हमारे मन मुताबिक नहीं हो पाता तो ऐसे समय पर हम अपनी प्रतिक्रिया को जिन उग्र भावनाओं के साथ व्यक्त करते हैं वही क्रोध है। क्रोध जब किसी मनुष्य पर हावी हो जाता है तो वह उसके सोचने समझने के शक्ति को खत्म करने लगता है। तब कई बार मनुष्य ऐसा काम भी कर जाता है जिसका उसे बाद में अफसोस भी होता है लेकिन फिर बाद में अफसोस करने का कोई फायदा नहीं होता है। जब क्रोध हमारे दिमाग पर छा जाता है तो हमें हर चीज बुरी दिखाई देती है। हर कोई गलत लगता है ऐसे में सही निर्णय लेना बहुत मुस्किल हो जाता है। और फिर क्रोध के कारण मनुष्य का पतन हो जाता है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।
अर्थ:- विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्य का पतन हो जाता है।
इस श्लोक में भगवान ने क्रोध की पूरी प्रक्रिया बताई है कि किसी के बारे में सोचने से उसके प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है फिर आसक्ति से उस वस्तु को पाने की कामना उत्पन्न होती है और जब वह वस्तु किसी कारण वश प्राप्त नहीं होती तो क्रोध आता है क्रोध की वजह से बुद्धि नष्ट हो जाती है और जिस मनुष्य की बुद्धि ही नष्ट हो जाए उसका तो पतन निश्चित है। इसीलिए मनुष्य को हमें अपने मन को सयमित रखना चाहिए।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।2.56।।
अर्थ:- दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है? जिसके मन से राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं? वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।।5.26।।
अर्थ:- काम और क्रोध से रहित, संयतचित्त वाले तथा आत्मा को जानने वाले यतियों के लिए सब ओर मोक्ष (या ब्रह्मानन्द) विद्यमान रहता है।
इस दोनों श्लोक के अनुसार जिस मनुष्य का मन किसी भी लोभ भय और क्रोध में भटकता नही है ऐसा मनुष्य शांति से अपना जीवन यापन करता है ऐसे मनुष्य को मोक्ष मिलता है। किसी के साथ झगड़ा करना मारपीट करना यह सब क्रोध की वजह से ही होता है अगर कोई हमारे साथ बुरा बर्ताव भी करें और हम उसकी प्रतिक्रिया में क्रोध न करते हुए समझदारी से और शांत भाव से स्थिति को संभालने का प्रयास करें तो उसके परिणाम काफी बेहतर हो सकते हैं।
लोभ - क्रोध के बाद जो तीसरा सबसे बड़ा शत्रु है वह है लोभ। मनुष्य की कामना ही उसमें लोभ पैदा करती है और लोभ के वश में मनुष्य चोरी, डकैती या इससे बड़ा अपराध कर देता है। लोभ के वशीभूत होकर मनुष्य का मन सांसारिक जीवन में उलझन जाता है और वह इसे मुक्त होने के बारे में कभी सोच ही नहीं पाता । जब भी हम किसी भौतिक सुख को प्राप्त करने के बाद हमारा मन आनंद से भर जाता है तब हमारे मन में इस आनंद को बार-बार अनुभव करने की इच्छा होने लगती है तो यही लोभ पैदा होने लगता है। लोभ यानी की लालच भी एक तरह से काम से ही जुड़ा हुआ है काम का मतलब है किसी चीज की इच्छा करना वही लोभ का मतलब है इस इच्छा की पूर्ति करने के लिए और ज्यादा पाने की चाहत रखना । लोभ का अंत आसानी से नहीं होता क्योंकि हमारी इच्छाओं की सीमा कभी खत्म नहीं होती इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए हम लगातार कोशिश करते रहते हैं इसी तरह धीरे-धीरे और ज्यादा और ज्यादा पाने की चाहत बढ़ने लगती है यही तो लोभ है जरूरी नहीं कि लोभ धन संपत्ति या रूपए पैसे को लेकर ही पैदा हो किसी भी भौतिक वस्तु के लिए हमारे मन में लोभ पैदा हो सकता है लोभ के वशीभूत होकर हमारी मानसिक दशा कुछ ऐसी हो जाती है कि हम यह तक नहीं देख पाते कि हमारी आवश्यकता की पूर्ति करने वाले साधन हमारे पास उपलब्ध हो चुके हैं कई बार पर्याप्त मात्रा में साधनों की उपलब्धि होने पर भी ज्यादा पाने की चाहत बनी रहती है और यही चाहत हमारे मन में लोभ को बढ़ाती है ऐसे में जरूरी है कि हम अपनी आवश्यकता को पहचाने और यह निश्चय करें कि आवश्यकता समाप्त हो जाए वहां साधनों को उपयोग जितना जल्दी ही बंद कर देना चाहिए । हमारा मन मस्तिष्क लोभ से मुक्त रहे
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च।।14.17।।
अर्थ:- सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है। रजोगुण से लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होता है।।
इस श्लोक के अनुसार चीजों को पाने से की इच्छा से लोभ जन्म लेता है। इसीलिए यह मानना चाहिए कि सभी चल अचल चीजे भगवान की है और उन्हे जब उचित समय लगेगा वह मुझे आवश्यकता अनुसार चीज दे देंगे।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षि।।17.25।।
अर्थ:- 'तत्' नामसे कहे जानेवाले परमात्माके लिये ही सब कुछ है -- ऐसा मानकर मुक्ति चाहनेवाले मनुष्यों द्वारा फलकी इच्छासे रहित होकर अनेक प्रकारकी यज्ञ और तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ की जाती हैं।
इस श्लोक के अनुसार जो मनुष्य यह मान लेता है कि सभी चीजे भगवान की है इससे हमारे मन में किसी चीज के प्रति लोभ उत्पन्न नहीं होता है। और हम लोभ से बच जाते है।
साथियों आज की चर्चा में हमने जाना कि हमारी इंद्रियों का भटकाव ही हमारी सभी दुखो का प्रमुख कारण है इसके लिए मेडिटेशन करके अपनी इंद्रियों को वश में करना चाहिए। मन में हमेशा दूसरों।का भला सोचना चाहिए और साथ ही मन में यह विचार लाने चाहिए कि सभी चीजे भगवान की है उन्हे जब भी भगवान को यह महसूस होगा कि अब यह चीज मुझे दे दी जाए तब वह चीज मुझे उपलब्ध करा देंगे। अगर हम अपने मन में यह भाव रखेंगे तो हमसे पाप कर्म नहीं होंगे जिससे हम नर्क जाने बच जायेंगे और हमे स्वर्ग प्राप्त होगा।
साथियों इसी के साथ आज की चर्चा यही समाप्त होती है। आज की चर्चा में सामिल होने के लिए आप सभी का धन्यवाद। आज की वीडियो में हमने काम , क्रोध और लोभ के बारे में जाना और साथ ही साथ यह भी जाना की इन शत्रुओं को कैसे समाप्त करना चाहिए। वीडियो अच्छी लगी हो तो वीडियो को लाईक करे शेयर करे। आगे की वीडियो में अपने अंदर के और 3 शत्रुओं और उन्हे सामना करने के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे इसीलिए अगर आप हमारे चैनल पर पहली बार आए है तो हमारे चैनल को subscribe करके हमारे साथ जुड़ जाइए। जल्द ही मिलते है इसी तरह की दूसरी वीडियो पर, तब तक के लिए राधे राधे
3rd video
मोह
जब हमें किसी भी व्यक्ति या वस्तु की इतनी ज्यादा आदत हो जाए कि हम उसके बिना रहने में असमर्थ हो जाए तो इसे ही मोह कहा जाता है मुंह में हम आंतरिक चेतना की उपेक्षा कर देते हैं और अज्ञानता को पोषित करते हैं यानी कि हम यह भूल जाते हैं कि असल में हम मनुष्य इस संसार का हिस्सा तो है परंतु हमारा अस्तित्व उसे परमात्मा के अंश के रूप में है हमें यह बात याद रखना चाहिए की भौतिक संसार में रहते हुए हम केवल अपने कर्तव्यों का निर्माण कर रहे हैं हमारे आसपास की भौतिक वस्तुएं और इस संसार में बने रिश्ते नाते सभी एक न एक दिन खत्म हो जाएंगे आपको ध्यान में रख ईश्वर में मन लगा तो हमारा मन मुंह से मुक्त हो जाता है और अज्ञान के कारण ही और उसे मानने से इनकार कर देते हैं हम अपने भौतिक शरीर के सुख को सब कुछ मान बैठे हैं और मोहर्रम इस संसार के कासन और बंधनों में फंसे रहते हैं मुंह किसी व्यक्ति से भी हो सकता है और वस्तुओं से भी हो सकता है हम सभी को अपने परिवार वालों से तो मोह होता ही है हमारे आसपास रहने वाले ऐसे लोग जिन्हें हमारे माता है दोस्त यह सभी हमारे मुंह का कारण बनते हैं मुंह के वशीभूत होकर कोई इंसान कुछ भी करने को तैयार हो जाता हैकई बार ऐसा भी होता है कि हम किसी के मुंह में इस तरह फस जाते हैं कि उसे व्यक्ति के अलावा हमें कुछ और दिखाई ही नहीं देता वह किसी भी रिश्ते में हो सकता है मां बेटे के रिश्ते में पति-पत्नी के रिश्ते में भाई-बहन के रिश्ते में दोस्त के रिश्ते में आप सबको रामायण का कैक प्रसंग तो बधाई होगा जिसमें महारानी को वनवास भेजने के लिए कहती है पूरी कामना के पीछे सबसे बड़ा कारण था उनका पुत्र उन्होंने भारत जी के मुंह में आकर महाराज दशरथ से ऐसा वचन मांगा था और इस मुंह के कारण बाद में उन्हें कितने सारे दुखों का सामना भी करना पड़ा था
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।2.63।।
Meaning:- From anger follows delusion; from delusion, failure of memory; from failure of memory, the loss of understanding; from the loss of understanding, he perishes.
अर्थ:- क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है।।
अहंकार - मनुष्य का जो एक और बड़ा दुश्मन है वह है मध्य का अर्थ अहंकार अथवा अभियान होता है जिसे हम एरोगेंस भी कहते हैं मत वह अब गुण है जिसमें मां केवल अपने ही सतपाल भरोसा करता है और कई बातों को समझ ले और मानने से इनकार कर देता है मत कई लोगों के पतन का कारण भी बनता है जब हम ऐसा सोचने लगते हैं कि हमारे द्वारा किया गया काम ही सर्वश्रेष्ठ है किसी भी क्षेत्र में हम ही सबसे बेहतर है सबसे आगे हैं और सबसे श्रेष्ठ है तो इसी भाव को मत कहा जाता है कुल मिलाकर जब कोई भी इंसानआपको मत कहा जाता है कुल मिलाकर जब कोई भी इंसान मैं की भावना को सर्वोपरि रखता है या जब उसे अपने सिवाय कोई दूसरा नजर नहीं आता क्या वह किसी दूसरे व्यक्ति को अपने बराबर नहीं समझता है तो उसे मानसिक अवस्था को ही मत कहा जाता है अपने ही मत में डूबे हुए इंसान के लिए किसी भी स्थिति को समझाना मुश्किल हो जाता है क्योंकि वह हर स्थिति में खुद को आगे रखकर सोता है ऐसे में कई बार वास्तविकता उसे दिखाई नहीं देती है जैसे मध्य में डूबा हुआ व्यक्ति कभी भी अपनी गलती नहीं मान सकता क्योंकि उसे लगता है कि वह जो कर रहा है वही सही है और ऐसे में उसे अपने आसपास के लोगों की काबिलियत भी दिखाई नहीं देती है और ना ही वह किसी की सलाह सुनता है और ना किसी की सलाह पर कॉल कर रामायण के प्रसंग को समझते हुए अगर हम मत का उदाहरण देखें तो रावण एक अहंकारी व्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है रावण को अपने ज्ञान का मत था और वह इसी मध्य में डूबा रहता था भगवान शिव से वरदान प्राप्त है उसे कोई नहीं मार सकता और नहीं होकर उसने कितने ही अपराध किया और उसका परिणाम भी उसे भुगतना ही पड़ा इस तरह मत के वशीभूत होकर हमारा मन मस्तिष्क भी सही गलत का निर्णय नहीं कर पता है
Bhagvad Gita on Pride
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।16.4।।
Meaning:- O son of Prtha, (the attributes) of one destined to have the demoniacal nature are religious ostentation, pride and haughtiness, [Another reading is abhimanah, self-conceit.-Tr.], anger as also rudeness and ignorance.
अर्थ:- हे पृथानन्दन ! दम्भ करना, घमण्ड करना, अभिमान करना, क्रोध करना, कठोरता रखना और अविवेकका होना भी -- ये सभी आसुरीसम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।
Important word:- ‘demoniacal nature’
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।16.13।।
Meaning:- 'This has been gained by me today; I shall acire this desired object. This is in hand; again, this wealth also will come to me.'
अर्थ:- मैंने आज यह पाया है और इस मनोरथ को भी प्राप्त करूंगा, मेरे पास यह इतना धन है और इससे भी अधिक धन भविष्य में होगा।।
Important word:- ‘desire’
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।16.15।।
Meaning:- 'I am rich and high-born; who else is there similar to me? I shall perform sacrifices; I shall give, I shall rejoice,'-thus they are diversely deluded by non-discrimination.
अर्थ:- मैं धनवान् और श्रेष्ठकुल में जन्मा हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है?",'मैं यज्ञ करूंगा', 'मैं दान दूँगा', 'मैं मौज करूँगा' - इस प्रकार के अज्ञान से वे मोहित होते हैं
Important word:- ‘non-descrimination’
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।।18.26।।
Meaning:- [Ast. introduces this verse with 'Idanim kartrbhedah ucyate, Now is being stated the distinctions among the agents.'-Tr.] The agent who is free from attachment [Attachment to results or the idea of agentship.], not egotistic, endowed with fortitude and diligence, and unperturbed by success and failure is said to be possessed of sattva.
अर्थ:- जो कर्ता संगरहित, अहंमन्यता से रहित, धैर्य और उत्साह से युक्त एवं कार्य की सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (विफलता) में निर्विकार रहता है, वह कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।।
Important word:- ‘Sattva’
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।18.58।।
Meaning:- Having your mind fixed on Me, you will cross over all difficulties through My grace. If, on the other hand, you do not listen out of egotism, you will get destroyed.
अर्थ:- मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।।
इर्ष्या - जलन की भावना को मानसरे की भावना कहते हैं इसमें लोग अपने सुख को पाने की कोशिश नहीं करते बल्कि दूसरों के सुख में डी उखियों के प्रति चिंतनकर मनुष्य में उनके प्रति लगाव आ सकती उत्पन्न हो जाती है उसे आसक्ति से कामना जन्म लेती है कामना से क्रोध जन्म लेता है क्रोध से मुंह जन्म लेता है मुंह से स्मृति का नाश हो जाता है बुद्धि का ना स होने मनुष्य का पतन हो जाता है और इस तरह सभी विकार मिलकर मांसाहारी को जन्म देते हैं जब भी किसी की तरक्की देखकर आपके मन में यह विचार आए यह इतना आगे कैसे बढ़ गया इससे ज्यादा डिस्टर्ब तो मैं करता था तो आपको सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि कहीं ना कहीं आपके मन में जन्म ले रही है हमें दूसरों के सुख को देखकर दुखी नहीं होना चाहिए बल्कि हमारे मन मस्तिष्क में शत्रु को आने से भी रोकता है हमारे मन में घर-घर जाए तो हम चाह कर भी अपने आसपास उपलब्ध सुख के साधनों को देख नहीं पाते हैं अपने सुख के बचाएं दूसरों के सुख पर जाता रहने लगता है तब में जो सुख हमें प्राप्त है वह भी फिर हमारे लिए मायने नहीं रख ता इसलिए हमेशा इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि जो हमें मिलता है उसी में संतुष्ट रहना चाहिए और दूसरों के सुपर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए मंत्र भगवान राम और भारत को एक साथ खेलते हुए देखी थी और माता कही गई को दोनों ही बालको पर सामान प्रेम लूटते हुए देखी थी मन में भगवान राम को लेकर चालान का भाव उत्पन्न होता था इसके वशीभूत होकर ही मंत्र के मन में विकार उत्पन्न हुआ और उसने माता कही गई पर इसके लिए दबाव डालना शुरू किया कि वह राम के बारे में ना सोचकर भारत के बारे में ही सूची इस तरह मंत्र के मन में जन्म लेने वाली ईर्ष्या नहीं माता कैकई के मन में भी विकार उत्पन्न किया तो अब आपको समझ आ गया होगा कि हमारे मन मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले यह भी कार्य हमारे सबसे बड़े दुश्मन है वैसे देखा जाए अलग-अलग नाम से बताए गए हैं मगर यह सभी एक साथ भी प्रभावित हो जाते हैं क्योंकि सभी आपस में ऐसा नहीं हो सकता है कि किसी भी मनुष्य में सिर्फ एक ही विकार का प्रभाव देखने को मिले अगर इन 6 दुश्मनों में से कोई एक भी आपके दिमाग पर हाफिज करें तो तुरंत ही आपको सतर्क हो जाने की आवश्यकता है मनुष्य का मन बड़ा चंचल होता है और वह स्वयं का दुश्मन बना लेता है उम्मीद है कि आपको इन दुश्मनों के बारे में अच्छी तरह समझ आ गया होगा और आगे से आप खुद को इनसे बचने की पूरी कोशिश कर पाएंगे
Bhagvad Gita on Envy
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।12.13।।
Meaning:- He who is not hateful towards any creature, who is friendly and compassionate, who has no idea of 'mine' and the idea of egoism, who is the same under sorrow and happiness, who is forgiving;
अर्थ:- भूतमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है।।
Important word:- ‘friendly, compassionate ’
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।
Meaning:- He who is ever content, who is a yogi, who has self-control, who has firm conviction, who has dedicated his mind and intellect to Me-he who is such a devotee of Mine is dear to Me.
अर्थ:- जो संयतात्मा, दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है, जो ऐसा मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।।
Important word:- ‘self-control ’
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।16.19।।
Meaning:- I cast for ever those hateful, cruel, evil-doers in the worlds, the vilest of human beings, verily into the demoniacla classes.
अर्थ:- ऐसे उन द्वेष करने वाले, क्रूरकर्मी और नराधमों को मैं संसार में बारम्बार (अजस्रम्) आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ।।
Important word:- ‘cruel ’
श्री भगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।
Meaning:- The Blessed Lord said Fearlessness, purity of mind, persistence in knowledge and yoga, charity and control of the external organs, sacrifice, (scriptural) study, austerity and rectitude
अर्थ:- श्रीभगवान् बोले -- भयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।
Important words:- fearlessness, yoga, sacrifice
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।16.2।।
Meaning:- Non-injury, truthfulness, absence of anger, renunciation, control of the internal organ, absence of vilification, kindness to creatures, non-covetousness, gentleness, modesty, freedom from restlessness.
अर्थ:- अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (किसी की निन्दा न करना), भूतमात्र के प्रति दया, अलोलुपता , मार्दव (कोमलता), लज्जा, अचंचलता।।
Important words:- Non-violence, truthfulness, absence of anger
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।16.3।।
Meaning:- Vigour, forgiveness, fortitude, purity, freedom from malice, absence of haughtiness-these, O scion of the Bharata dynasty, are (the alties) of one born destined to have the divine nature.
अर्थ:- हे भारत ! तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (शुद्धि), अद्रोह और अतिमान (गर्व) का अभाव ये सब दैवी संपदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।।
Important word:- Vigour, forgiveness
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।2.63।।
Meaning:- From anger follows delusion; from delusion, failure of memory; from failure of memory, the loss of understanding; from the loss of understanding, he perishes.
अर्थ:- क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है।।
Bhagvad Gita on Lust
श्री भगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।3.37।।
Meaning:- The Blessed Lord said This desire, this anger, born of the ality of rajas, is a great devourer, a great sinner. Know this to be the enemy here.
अर्थ:- श्रीभगवान् ने कहा -- रजोगुण में उत्पन्न हुई यह 'कामना' है, यही क्रोध है; यह महाशना (जिसकी भूख बड़ी हो) और महापापी है, इसे ही तुम यहाँ (इस जगत् में) शत्रु जानो।।
Important word:- ‘Rajas ’
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।3.41।।
Meaning:- Therefore, O scion of the Bharata dynasty, after first controlling the organs, renounce this one [A variant reading is, 'prajahi hi-enam, completely renounce this one'.-Tr.] which is sinful and a destroyer of learning and wisdom.
अर्थ:- इसलिये हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! तू सबसे पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल।
Important word:- ‘control and destroy ’
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।3.43।।
Meaning:-[The Ast, introdcues this verse with, 'Tatah kim, what follows from that?'-Tr.] Understanding the Self thus [Understanding৷৷.thus:that desires can be conered through the knowledge of the Self.] as superior to the intellect, and completely establishing (the Self) is spiritual absorption with the (help of) the mind, O mighty-armed one, vanish the enemy in the form of desire, which is difficult to subdue.
अर्थ:- इन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे भी पर है वह (काम) है। इस तरह बुद्धिसे पर - (काम-) को जानकर अपने द्वारा अपने-आपको वशमें करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।
Important word:- ‘enemy, desire’
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।।5.22।।
Meaning:- Since enjoyments that result from contact (with objects) are verily the sources of sorrow and have a beginning and an end, (therefore) O son of Kunti, the wise one does not delight in them.
अर्थ:- हे कौन्तेय (इन्द्रिय तथा विषयों के) संयोग से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं वे दु:ख के ही हेतु हैं, क्योंकि वे आदि-अन्त वाले हैं। बुद्धिमान् पुरुष उनमें नहीं रमता।।
Important word:- ‘sorrow’
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।16.21।।
Meaning:- This door of hell, which is the destroyer of the soul, is of three kinds-passion, anger and also greed. Therefore one should forsake these three.
अर्थ:- काम, क्रोध और लोभ -- ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये।