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चाणक्य नीति के अनुसार समाज



चाणक्य नीति के अनुसार समाज के साथ ऐसे  व्यवहार करे, वास्तविक सुख मिलेगा


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साथियों आज हम चर्चा करेंगे कि आचार्य चाणक्य के अनुसार वास्तविक सुख क्या है। और किस तरह व्यवहार को अपना कर वास्तविक सुख को पाया जा सकता है। आइए आज की चर्चा प्रारंभ करते है।


सबसे पहले हम जानते है कि आचार्य ने किसे वास्तविक सुख बताया है।


चाणक्य नीति के अध्याय 2 श्लोक 3 के अनुसार जिसका बेटा वश में रहता है, पत्नी पति की इच्छा के अनुरूप कार्य करती है। जो धन के कारण पूरी तरह संतुष्ट है। उसके लिए पृथ्वी ही स्वर्ग के समान है। 


प्रत्येक व्यक्ति इस संसार में सुखी रहना चाहता है यही तो स्वर्ग है। स्वर्ग में भी सभी प्रकार के सुखों का उपभोग करने की कल्पना की गई है इस बारे में चाणक्य कहते हैं। जिसका पुत्र उसकी बात मानता है। जिसकी पत्नी उसकी ईच्छा के अनुसार कार्य करती है। जो अपने कमाए हुए धन से संतुष्ट है ज्यादा कमाने की इच्छा तो है, लेकिन कोई लालच नहीं है। ऐसे मनुष्य के लिए इस धरती में ही स्वर्ग है।


जो व्यक्ति संतोष रूपी अमृत से तृप्त है मन से शांत है उसे जो सुख प्राप्त होता है वह धन के लिए इधर-उधर दौड़-धूप करने वालों को भी कभी प्राप्त नहीं होता है संतोष की बड़ी महिमा है जो व्यक्ति संतोष के कारण अपना जीवन व्यतीत करते हैं और शांत रहते हैं उन्हें जितना सुख प्राप्त होता है वह धन के लालच के लिए हर समय दो टूक करने वाले व्यक्ति को प्राप्त नहीं हो सकता है।


 इस विषय में एक अन्य श्लोक पर चर्चा करते है। क्योंकि मैं कभी भी एक श्लोक पर चर्चा नही करता नही तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। 



चाणक्य नीति के अध्याय 2 श्लोक 2 के अनुसार भोजन के लिए अच्छे प्रदार्थ का उपलब्ध होना। उसे खाकर पचाने की शक्ति होना, सुंदर स्त्री का मिलना, उसके उपभोग के लिए कामशक्ति का होना, धन के साथ-साथ दान देने की इच्छा का होना—ये बात मनुष्य को किसी महान तप के कारण प्राप्त होती है। 


हम तप के माध्यम से सुख की कामना करते है। भोजन में अच्छी वस्तुओ की कल्पना है सभी करते हैं परंतु वस्तुएं प्राप्त होना और उसे पचाने की शक्ति होना भी आवश्यक है प्रत्येक पर प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसे सुंदर स्त्री मिले लेकिन उसके उपभोग के लिए व्यक्ति में काम शक्ति भी होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसके पास धन हो लेकिन धन प्राप्ति के बाद कितने ऐसे लोग हैं जो उसका सदुपयोग कर पाते हैं। अच्छी जीवनसंगिनी, अच्छी शारीरिक शक्ति, धन और वक्त जरूरत पर किसी के काम आने की प्रवृत्ति आदि पूर्व जन्मों के कर्मों का फल होता है।


जो व्यक्ति धन धन के लेनदेन में विद्या अथवा किसी कला के सीखने में भोजन के समय अथवा व्यवहार में लज्जा हीन होता है अर्थात संकोच नहीं करता है वह सुखी रहता है। इसे ही वास्तविक सुख कहते है। 


अब जानते है कि चाणक्य के अनुसार वे कौन से व्यवहार है जिन्हे अपना कर हम वास्तविक सुख पा सकते है। 


चाणक्य नीति के अध्याय 12 श्लोक 3 के अनुसार अपने बंधु बांधव के साथ वही व्यक्ति सुख से रह सकता है, जो उनके साथ

सज्जनता और न्रमता का व्यवहार करता है, दूसरे लोगो पर दया और दुर्जनों के प्रति भी

उनके अनुकूल व्यवहार करता है, सज्जन लोगो से जो प्रेम रखता है, दुष्टों के प्रति जो कठोर होता है और विद्वानों के साथ सरलता से पेश आता है। जो शक्तिशाली लोगो के साथ शूरवीरता और पराक्रम से काम लेता है, गुरु, माता-पिता और आचार्य के साथ जो सहनशीलता पूर्ण व्यवहार रखता है तथा स्त्रियों के प्रति अधिक विश्वास न करके जो उनके प्रति चतुराई पूर्ण व्यवहार करता है, वही कुशलता पूर्वक इस संसार में रह सकता है। 


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसिकरण उसे समाज के साथ कुशलता पूर्वक व्यवहार करना चाहिए। यह व्यवहार मनुष्य को संसार में वास्तविक सुख दिला सकते है। आचार्य चाणक्य ने मनुष्य को वह व्यवहार बताए है जिनका मनुष्य उपयोग करके समाज में सुख से रह सकता है। आइए जानते है मनुष्य का समाज में किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए।


सगे संबंधियों के प्रति - चाणक्य के अनुसार अपने सगे संबंधियों के साथ सज्जनता और न्रमता का व्यवहार करना चाहिए जिससे वह लोग भी आपके प्रति सज्जनता और न्रमता का व्यवहार करे। जिससे सभी सुख पूर्वक रह सके।


दुर्जन लोगो के प्रति - आचार्य के अनुसार दुर्जन लोगो के साथ जैसे तो तैसा वाला व्यवहार करना चाहिए। अर्थात जो व्यक्ति आपके साथ जैसा व्यवहार करे उसके साथ उसी के अनुकूल व्यवहार करना चाहिए।


सज्जन लोगो के प्रति - आचार्य के अनुसार सज्जन लोग प्रेम के भूखे होते है अतः सज्जन लोगो के साथ प्रेम पूर्वक व्यवहार करना चाहिए। इससे आपको समाज में यश मिलेगा।


दुष्टों के प्रति - आचार्य ने हमेशा दुष्टों के प्रति बहुत ही कठोर नीति अपनाई थी। इसी संदर्भ में वह हमे भी दुष्टों के प्रति बहुत ही कठोरता का व्यवहार करने को कहते है। दुष्टों को कभी भी क्षमा नहीं करना चाहिए। दुष्टों का समूल नाश कर देना चाहिए।


शक्ति शाली लोगो के प्रति - जो व्यक्ति शक्ति शाली और शूरवीर हो आचार्य के अनुसार ऐसे व्यक्ति के साथ शूरवीरता और पराक्रम का व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि यह लोग ऐसा ही व्यवहार पसंद करते है।



गुरु, माता पिता, और आचार्य के प्रति - आचार्य के अनुसार गुरु, माता पिता और आचार्य को हमेशा सम्मान देना चाहिए। अगर यह लोग कभी गलत बोले तो उसे भी सहन करना चाहिए। क्योंकि यह लोग कभी भी आपका अहित नहीं चाहेंगे।


स्त्रियों के प्रति - आचार्य के अनुसार स्त्रियों पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए। इनके प्रति सजग होकर चतुराई पूर्वक व्यवहार करना चाहिए।


ये तो हुई आचार्य की बात वैसे मैं व्यक्तिगत रूप से आचार्य चाणक्य का बहुत सम्मान करता हूं उनकी सभी नीतियों को अपने जीवन में अपनाने की कोशिश करता हूं। लेकिन जब बात स्त्रियों के प्रति व्यवहार की आती है तो मुझे इनकी नीतियां समझ में नही आती । स्त्रियों के प्रति आचार्य की नीतियां संदेह से युक्त है। हो सकता है इसके लिए तत्कालीन समाज का प्रभाव हो, क्योंकि गौतम बुद्ध ने भी प्रारंभ में बौद्ध धर्म में स्त्रियों के प्रवेश के लिए मना किया था, लेकिन अपने प्रिय शिष्य आनंद के आग्रह पर बौद्ध धर्म में स्त्रियों के प्रवेश की अनुमति प्रदान की थी।  


मेरे अपने अनुभव के अनुसार स्त्रियां प्रेम और सम्मान की भूखी होती है स्त्रियों के साथ प्रेम और सम्मान का व्यवहार करना चाहिए। चाहे वह मां हो बहन हो बेटी हो पत्नी हो या मित्र हो। उन्हे हमेशा प्यार और सम्मान देना चाहिए।


साथियों चाणक्य नीति में बताए गए व्यवहारों को अपने जीवन में अपना अपने जीवन सुखमय बनाइए। 


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चाणक्य नीति के अध्याय 1 श्लोक 5 के अनुसार दुष्ट स्वभाव वाली, कठोर वचन बोलने वाली, दुराचारिणी स्त्री और धूर्त और दुष्ट स्वभाव वाला मित्र सामने बोलने वाला मुंहफट नौकर और ऐसे घर में निवास जहां सांप के होने की संभावना हो ये सब बाते मृत्यु के समान है। 


चाणक्य नीति के अध्याय 1 श्लोक 4 के अनुसार मूर्ख शिष्य को उपदेश देने, दुष्ट- व्यभाचारिणी स्त्री का पालन-पोषण करने, धन के नष्ट होने तथा दुखी व्यक्ति के साथ व्यवहार रखने से बुद्धिमान व्यक्ति को भी कष्ट उठाना पड़ता है। 

चाणक्य नीति के अध्याय 1 श्लोक 17 के अनुसार पुरुषो के अपेक्षा स्त्रियों का आहार अर्थात भोजन दोगुना होता है, बुद्धि चौगुनी,
साहस छह गुना और कामवासना आठ गुना होती है। 

चाणक्य नीति के अध्याय 2 श्लोक 1 के अनुसार झूठ बोलना, बिना सोचे समझे किसी काम को प्रारंभ कर देना, दुस्साहस करना, छलकपट करना, मूर्खता पूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्र रहना और निर्दयता- ये स्त्रियों के स्वाभाविक दोष है। 

चाणक्य नीति के अध्याय 2 श्लोक 15 के अनुसार जो वृक्ष नदी के किनारे उगते है, जो स्त्री दुसरो के घर में।रहती।है जिस राजा के मंत्री अच्छे नहीं होते है। वे जल्द नष्ट हो जाते है इसमें कोई भी संशय नहीं है। 

चाणक्य नीति के अध्याय 2 श्लोक 17 के अनुसार  वैश्या निर्धन पुरुष को, प्रजा पराजित राजा को, पक्षी फलहीन वृक्ष को और अचानक आया हुआ अतिथि  भोजन करने के बाद घर को त्याग को चले जाते है। 


चाणक्य नीति के अध्याय 2 श्लोक 20 के अनुसार प्रेम व्यवहार बराबरी वाले व्यक्ति में ठीक रहता है। यदि नौकरी करनी ही हो तो
राजा की नौकरी करनी चाहिए। कार्य अथवा व्यवसाय में सबसे अच्छा काम व्यवसाय करना
है। इसी प्रकार उत्तम गुणों वाली स्त्री की शोभा घर में है।  

चाणक्य नीति के अध्याय 3 श्लोक 9 के अनुसार कोयल का सौंदर्य उसके स्वर में है  उसकी मीठी आवाज  में है, स्त्रियों का सौंदर्य उनका पतिव्रता होना है, कुरूप लोगो का सौंदर्य उनकी विद्यावान होने में है। और तपस्यियो का सौंदर्य उनकी क्षमावान होने में है  

चाणक्य नीति के अध्याय 4 श्लोक 8 के अनुसार अशिक्षित तथा अनुपयुक्त स्थान या ग्राम में।रहना नीच व्यक्ति के सेवा, अरुचिकर और पाष्टिकता से रहित भोजन करना, झगड़ालू स्त्री  मूर्ख पुत्र और विधवा कन्या , ये छह बाते ऐसी है तो बिना अग्नि  के ही शरीर को जलाती रहती है। 

चाणक्य नीति के अध्याय 4 श्लोक 10 के अनुसार इस संसार में दुखी लोगो को तीन बातो से ही शांति  हो सकती है—अच्छी 
संतान, पतिव्रता पत्नी और सज्जन का संग। 

चाणक्य नीति के अध्याय 4 श्लोक 13 के अनुसार पति के लिए वही पत्नी उपयुक्त होती है, जो मन, वचन और कर्म से एक जैसी हो और अपने कार्यों में निपुण हो, इसके साथ ही वह अपने पति से प्रेम रखने वाली तथा सत्य बोलने वाली होनी चाहिए  ऐसी स्त्री को ही श्रेष्ठ पत्नी माना जा सकता है। 

चाणक्य नीति के अध्याय 5 श्लोक 15 के अनुसार विदेश में विद्या ही मनुष्य की सबसे सच्ची मित्र होती है।  घर में अच्छे स्वभाव वाली और गुणवती पत्नी ही मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती है। रोगी व्यक्ति को दवाई मित्र है और जो मनुष्य मार गया होता है धर्म कर्म ही उसका मित्र होता है। 

चाणक्य नीति के अध्याय 6 श्लोक 12 के अनुसार बुरे राज्य की अपेक्षा किसी प्रकार का राज्य न होना अच्छा है। दुष्ट मित्र के अपेक्षा मित्र न होना अच्छा है। दुष्ट शिष्यों की अपेक्षा शिष्य न होना अच्छा है। और दुष्ट पत्नी का पति होने से अच्छा है पत्नी ही न हो।