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चाणक्य नीति के अनुसार इन चीजों में संतोष करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है



आचार्य चाणक्य के द्वारा लिखित चाणक्य नीति में आचार्य ने संतोष को मानसिक शांति के लिए आवश्यक बताया है। इसके साथ ही आचार्य ने यह भी बताया है कि किन चीजों में हमे संतोष करना चाहिए और किन चीजों में हमे संतोष नहीं करना चाहिए। 

अध्याय 7 श्लोक 3 के अनुसार जो व्यक्ति संतोष रूपी अमृत से तृप्त है मन से शांत है उसे जो सुख प्राप्त होता है वह धन के लिए इधर-उधर दौड़-धूप करने वाले को कभी प्राप्त नहीं होता है।

चाणक्य नीति में आचार्य ने मानव जीवन के नीति के कई श्लोक लिखे है ज्यादातर लोग इन श्लोक को एक एक करके पढ़ते है और उनका अर्थ समझते है। लेकिन मेरा मानना है कि आचार्य की मंशा जानने के लिए श्लोको के अर्थ को अलग अलग नही पढ़ कर बल्कि उस विषय से संबंधित सभी श्लोको का एक साथ पढ़ना और उनका अर्थ समझना चाहिए। नही तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। इसका उदाहरण हम आज देखेंगे।

अब इस श्लोक का यह अर्थ हुवा कि व्यक्ति को संतोष करना चाहिए। अर्थात व्यक्ति आज जिस पद पर है जीवन भर उसी पद रहना चाहिए। ज्ञान और योग्यता हासिल कर उससे आगे बढ़ने के बारे में नही सोचना चाहिए। अब दूसरे श्लोक को देखते है

अध्याय 7 श्लोक 4 के अनुसार अपनी पत्नी, भोजन और धन इन चीजों के प्रति मनुष्य को संतोष रखना चाहिए परंतु विद्या अध्ययन, तप और दान के प्रति कभी संतोष नहीं करना चाहिए।

आपने देखा कि दूसरे श्लोक से यह बात स्पष्ट हों जाता है कि आचार्य ने कुछ ही चीजों में संतोष करने के लिए लिखा लेकिन और कुछ चीजों में संतोष करने से मना किया है। अब केवल पहले श्लोक को पढ़ने से अर्थ का अनर्थ हो जाता।

अब इन दोनो श्लोको को सामूहिक रूप से समझते है। आचार्य चाणक्य ने बताया है कि संतोष को अमृत के समान बताया है और कहा कि जो व्यक्ति संतोष से अपना जीवन बिताते हैं और शांत रहते हैं उन्हें जो सुख प्राप्त होता है वह धन के लालच में इधर उधर दौड़ धूप करने वाले व्यक्ति को प्राप्त नहीं हो सकता है। 

आचार्य के अनुसार व्यक्ति को अपनी पत्नी या अपना पति, अपना भोजन और अपना धन और आय से संतोष करना चाहिए।  

आपकी पत्नी या आपका पति जैसा हो उसमे संतोष करना चाहिए। अगर कोई दूसरे स्त्री और दूसरे पुरुष से अनैतिक संबंध बनाता है तो उसके जीवन से मानसिक शांति खत्म हो जाती है। और घर में पारिवारिक कलह शुरू हो जाता है। 

 इसी प्रकार व्यक्ति जब अपने घर के बने हुए भोजन से संतोष नहीं करता, भोजन का अपमान कर बाहर का खाना खाता है इससे उसका धन और स्वास्थ्य दोनो का नुकसान होता है। 

अगर व्यक्ति अपनी आय और धन से संतोष नहीं करता और दुसरो के धन पर दृष्टि रखता है तो उसका मन गलत कामों की तरफ बढ़ जाता है। हमारा मन दुसरो की आय पर न होकर विद्यार्जन और योग्यता हासिल कर अपनी आय को बढ़ाने पर होना चाहिए।

आचार्य ने विद्या अध्ययन , तप और दान करने में संतोष करने से मना किया है। आचार्य का तात्पर्य है कि आप में जितना सामर्थ्य है उतने सामर्थ्य के साथ इन चीजों को करने का प्रयास करना चाहिए। ये तीनों बहुत ही व्यापक विषय है इन पर हम आने वाले वीडियो पर चर्चा करेंगे।