जय श्री कृष्णा, साथियों, आशा है आप सभी कुशल मंगल से होंगे चाणक्य नीति में आज से हम नई वीडियो सीरीज स्टार्ट कर रहे है। इस वीडियो सीरीज में हम जानेंगे कि आचार्य चाणक्य के अनुसार माता और पिता के अपने बच्चों के प्रति क्या दायित्व है और माता और पिता को अपने दायित्वों का निर्वाहन किस प्रकार करना चाहिए। जैसा कि हमारी परंपरा रही है हम किसी विषय पर चर्चा करते है तो कोशिश करते है कि उस विषय का कोई भी पहलू छूट न जाए और इसीलिए कई बार हमारा विषय एक वीडियो में समाहित नही हो पाता है और हमे वीडियो की सीरीज लानी पड़ती है। सीरीज आज की वीडियो में हम चर्चा करेंगे कि आचार्य चाणक्य के अनुसार परिवार में कौन कौन से सदस्य सामिल है और कौन सा परिवार स्वर्ग के समान सुखी है तो आइए आज की वीडियो पर चर्चा प्रारंभ करते है।
साथियों चाणक्य कालीन समाज पुरुष प्रधान समाज था उस समय परिवार में पुरुषो का प्रभुत्व था जिस की झलक चाणक्य नीति में भी दिखाई देती है। आचार्य ने अपने श्लोक में पिता और पुत्र के रिश्ते के संबंध के बारे में ही लिखा है। जबकि आधुनिक समाज में ऐसा नहीं है आज जीवन के हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों से कंधे से कंधा मिला कर चल रही है। आसान शब्दों में चाणक्य कालीन समाज सिंगल इंजन समाज था जबकि आधुनिक समाज डबल इंजन समाज है जिसमे परिवार के सभी दायित्वों का निर्वाहन महिला और पुरुष बराबर बराबर मिलकर रहे है।
इसीलिए समझने में आसानी के लिए आचार्य में अपने श्लोक में जहां भी कही भी पिता के बारे में बताया होगा वहा हम माता और पिता दोनो को समझेंगे और जहा कही भी पुत्र के बारे में कुछ बताया होगा वहा पर पुत्र और पुत्री दोनो को समझेंगे।
माता पिता और पुत्र पुत्री के रिश्ते के बारे में जानने से पहले हमारे लिए यह जानना बहुत आवश्यक है कि आचार्य ने परिवार के बारे में क्या संकल्पना की है उनके अनुसार परिवार में कौन कौन से सदस्य सामिल है जिससे हमे एक परिवार में माता पिता और उनके बच्चो के बीच के रिश्ते को समझने में आसानी होगी। परिवार को समझने के लिए हम पहले आचार्य के 3 श्लोक का अर्थ जानेंगे और फिर उन श्लोक पर विस्तृत चर्चा करेंगे। पहला श्लोक है
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी ।
विभवे यश्च सन्तुष्टस्तस्य स्वर्ग इहैव हि ॥ ०२-०३
yasya putro vaśībhūto bhāryā chandānugāminī ।
vibhave yaśca santuṣṭastasya svarga ihaiva hi ॥ 02-03
अर्थात- जिसका पुत्र आज्ञाकारी हो जिसकी पत्नी पति के अनुकूल आचरण करने वाली हो, पतिव्रता हो एवं जो प्राप्त धन से ही सन्तुष्ट हो, ऐसे व्यक्ति के लिए स्वर्ग यहीं है, यह जानना चाहिए।
इस श्लोक के अनुसार जिस घर में बच्चे अपने माता पिता का कहना मानते हो क्योंकि माता पिता अपने बच्चे को कभी भी गलत मार्ग नहीं बताएंगे। पति और पत्नी में अच्छी बाउंडिंग हो दोनो एक दूसरे पर विश्वास करते हो। और दोनो हर तरह से अपने पास रखे पैसे से संतुष्ट हो अर्थात घर में पैसे के लिए कलह न हो। ऐसा परिवार स्वर्ग के समान सुखी है। अन्य श्लोक में हम जानेंगे कि परिवार पर कोई मुसीबत आती है तो कौन सहारा देता है।
संसारतापदग्धानां त्रयो विश्रान्तिहेतवः ।
अपत्यं च कलत्रं च सतां सङ्गतिरेव च ॥ ०४-१०
saṃsāratāpadagdhānāṃ trayo viśrāntihetavaḥ ।
apatyaṃ ca kalatraṃ ca satāṃ saṅgatireva ca ॥ 04-10
अर्थात:-जब व्यक्ति जीवन के दुःख से झुलसता है उसे निम्नलिखित ही सहारा देते है… १. पुत्र और पुत्री २. पत्नी ३. भगवान् के भक्त.
इस श्लोक के अनुसार जब आपका परिवार स्वर्ग के समान सुखी होगा तब परिवार पर कोई भी मुसीबत आएगी तो आपसी विश्वास के परिवार के सभी सदस्य मिलकर उस मुसीबत का सामना करते है। परिवार के सदस्यों के साथ साथ समाज के ज्ञानी लोग अर्थात भगवान के भक्त भी उस मुसीबत का सामना करने में परिवार के सहायता करते है। अब क्या हो जब परिवार में।पुत्र और पुत्री ही न हो।
अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्त्वबान्धवाः ।
मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता ॥ ०४-१४
aputrasya gṛhaṃ śūnyaṃ diśaḥ śūnyāstvabāndhavāḥ ।
mūrkhasya hṛdayaṃ śūnyaṃ sarvaśūnyā daridratā ॥ 04-14
अर्थात:-जिस व्यक्ति के पुत्र नहीं है उसका घर उजाड़ है. जिसे कोई सम्बन्धी नहीं है उसकी सभी दिशाए उजाड़ है. मुर्ख व्यक्ति का ह्रदय उजाड़ है. निर्धन व्यक्ति का सब कुछ उजाड़ है.
अर्थात जिस परिवार में कोई पुत्र या पुत्री नही है अर्थात वह परिवार, परिवार कहलाने के लायक नही है। ऐसा परिवार उजाड़ है अर्थात बिलकुल शून्य है।
अब इन तीनों श्लोक पर सम्मिलित रूप विस्तृत चर्चा करते है।
चाणक्य नीति के अनुसार जिस व्यक्ति के पास ऐसा पुत्र और पुत्री हो जो अपने माता-पिता का सम्मान करती हो और माता पिता का कहना मानती हो जिससे वे गलत राह से दूर हो ऐसे पुत्र और पुत्री माता पिता का गौरव होता है. भविष्य में कुल का नाम रोशन करते है. ऐसे बच्चों के माता-पिता के लिए ये जीवन स्वर्ग की तरह सुखी होता है.
जिस परिवार में पति और पत्नी एक दूसरे की बात मानते हो एक दूसरे का सम्मान करते हो समाज में एक दूसरे की बुराई नही करते हो ऐसा परिवार स्वर्ग से कम नहीं होता. ऐसे युगल एक दूसरे के सच्चे साथी होते है जो सुख-दुख में साथ निभाते है. उस परिवार में हमेशा सुख शांति बनी रहती है।
संस्कारवान बच्चो और श्रेष्ठ पति पत्नी के अलावा जिस परिवार के पास पर्याप्त धन भी होना चाहिए है, जिससे जीवन में किसी चीज का अभाव नहीं होता. ऐसे घर में परिवार के सदस्यों को सारे सुख मिलते हैं और जीवन शांति से गुजरता है. ऐसा व्यक्ति वास्तव में धरती पर ही स्वर्ग देख लेता है.
पर्याप्त धन से आशय ऐसे धन संपदा है जिससे परिवार संतुष्ट हो धन संपत्ति के लिए घर में कलह न मचती हो। और परिवार के लोग उस पैसे को परिवार के उन्नति के कार्यों में लगाते हो। परिवार में पैसे को लेकर एक दूसरे चोरी न हो एक दूसरे से पैसों को छुपाते न हो।
एक परिवार में माता पिता और उनके बच्चे होने चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि दादा दादी परिवार का हिस्सा नहीं है। दादा दादी भी परिवार का हिस्सा है क्योंकि दादा दादी भी माता पिता है और वर्तमान परिवार के पिता उनके पुत्र है। अर्थात एक परिवार में दादी दादा माता पिता उनके बच्चे होने चाहिए।
साथियों इसी के साथ आज की चर्चा यही समाप्त होती है। वीडि पोलयो को लेकर कोई सलाह या सुझाव हो तो कमेंट अवश्य करे। वीडियो अच्छी लगी हो तो वीडियो लाईक करे। वीडियो को शेयर करे ताकि यह वीडियो किसी जरूरत मंद के काम आ सके। आगे आने वाली वीडियो में जानेंगे कि माता पिता को अपने बच्चे का लालन पालन किस प्रकार करना चाहिए इसीलिए अगर आप हमारे चैनल पर पहली बार आए है तो हमारे चैनल को subscribe करके हमारे साथ जुड़ जाइए। आज की चर्चा में सामिल होने के लिए आप सभी का धन्यवाद, राधे राधे
जय श्री कृष्णा, साथियों, आशा है आप सभी कुशल मंगल से होंगे। चाणक्य नीति में इस समय हम वीडियो की सीरीज कर रहे है। इस वीडियो सीरीज में हम जानेंगे कि आचार्य चाणक्य के अनुसार माता और पिता के अपने बच्चों के प्रति क्या दायित्व है और माता और पिता को अपने दायित्वों का निर्वाहन किस प्रकार करना चाहिए। इसी सीरीज में आज की वीडियो में हम चर्चा करेंगे कि आचार्य चाणक्य के अनुसार कैसी संतान होने से बेहतर है कि माता पिता निसंतान रहे साथ ही जानेंगे कि बच्चो की लालन पालन की 4 अत्यंत महत्वपूर्ण बातें क्या है जिनका प्रयोग हर माता पिता को करना चाहिए। तो आइए आज की वीडियो पर चर्चा प्रारंभ करते है।
सबसे पहले इस विषय पर चाणक्य नीति से कुछ श्लोक को देख लेते है फिर सम्मिलित रूप से उन 4 महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा करेंगे जो हर माता पिता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पहले जानते है कि जुड़वा बच्चों के स्वभाव में अंतर क्यों होता है
एकोदरसमुद्भूता एकनक्षत्रजातकाः ।
न भवन्ति समाः शीले यथा बदरकण्टकाः ॥ ०५-०४
ekodarasamudbhūtā ekanakṣatrajātakāḥ ।
na bhavanti samāḥ śīle yathā badarakaṇṭakāḥ ॥ 05-04
अर्थ:-एक ही नक्षत्र अथवा एक ही समय में और एक ही माँ के गर्भ से उत्पन्न जुड़वाँ बच्चे भी समान स्वभाव के नहीं होते, उदाहरण के लिए बेर के वृक्ष में बेर के फल भी उत्पन्न होते हैं और कांटे भी उगते हैं, पर उन दोनों का स्वभाव भिन्न हैं फल तो लोगो को स्वाद और तृप्ति देते हैं परन्तु कांटे चुभन पैदा करने के रूप में दुःख देते हैं।
इस श्लोक के अनुसार एक ही समय में एक ही मां से जन्मे जुड़वा बच्चों के स्वभाव में बहुत अंतर हो सकता है आपने कई मूवी में ऐसा देखा होगा, जैसे मूवी राम और श्याम या मूवी सीता और गीता इत्यादि, । वास्तव में अंतर बच्चो के लालन पालन का होता है अंतर बच्चो की परवरिश का होता है। अंतर बच्चो की संगति का होता है, अंतर उन गुणों का जो माता पिता अपने बच्चे को देते है और अंतर बच्चो की उन मानसिक स्थति का होता है जिससे बच्चा समाज से गुणों को ग्रहण करता है । यह बात भी आपने मूवी में देखी होगी। जो बच्चा डाकुओं के पास पहुंच जाता है वह डाकू बन जाता है और जो बच्चा अच्छे समाज में रहता है वह समाज के लिए अच्छा उदाहरण बनता है हीरो बनता है। आइए अब जानते है बच्चो का लालन पालन कैसे करना चाहिए
दर्शनध्यानसंस्पर्शैर्मत्सी कूर्मी च पक्षिणी ।
शिशुं पालयते नित्यं तथा सज्जन-संगतिः ॥ ०४-०३
darśanadhyānasaṃsparśairmatsī kūrmī ca pakṣiṇī ।
śiśuṃ pālayate nityaṃ tathā sajjana-saṃgatiḥ ॥ 04-03
Meaning:- As long as your body is healthy and under control and death is distant, try to save your soul; when death is immanent what can you
अर्थ:-जैसे मछली दृष्टी से, कछुआ ध्यान देकर और पंछी स्पर्श करके अपने बच्चो को पालते है, वैसे ही संतजन पुरुषों की संगती मनुष्य का पालन पोषण करती है.
इस श्लोक के अनुसार हमे अपने बच्चो की शिक्षा के लिए अच्छे स्कूल में भेजना चाहिए और यह भी देखना चाहिए की बच्चे योग्य अध्यापक की निगरानी में रहे और बच्चो की संगति अच्छी हो। लेकिन बच्चे है योग्य अध्यापकों कि निगरानी में रहना पसंद नही करते ।
साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रमित्राणि बान्धवाः ।
ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम् ॥ ०४-०२
sādhubhyaste nivartante putramitrāṇi bāndhavāḥ ।
ye ca taiḥ saha gantārastaddharmātsukṛtaṃ kulam ॥04-02
अर्थ:-पुत्र , मित्र, सगे सम्बन्धी साधुओं को देखकर दूर भागते है, लेकिन जो लोग साधुओं का अनुशरण करते है उनमे भक्ति जागृत होती है और उनके उस पुण्य से उनका सारा कुल धन्य हो जाता है |
श्लोक के अनुसार बच्चे स्वतंत्र होकर खेलना पसंद करते है इसीलिए बच्चे अध्यापकों की निगरानी से बचना चाहते है लेकिन हमे कड़ाई से बच्चो को अनुशासन का पाठ पढ़ाना चाहिए। जिससे बच्चो के मन में पढ़ाए प्रति इच्छा जागृत हो और वो कुल को सम्मानित कर सके।
लालनाद्बहवो दोषास्ताडने बहवो गुणाः ।
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत् ॥ ०२-१२
lālanādbahavo doṣāstāḍane bahavo guṇāḥ ।
tasmātputraṃ ca śiṣyaṃ ca tāḍayenna tu lālayet ॥ 02-12
अर्थात लाड-प्यार से बच्चों मे गलत आदते ढलती है, उन्हें कड़ी शिक्षा देने से वे अच्छी आदते सीखते है, इसलिए बच्चों को जरुरत पड़ने पर दण्डित करें, ज्यादा लाड ना करें।
श्लोक के अनुसार अगर बच्चो को सही मार्ग में लाना है तो उन्हे ज्यादा लाड-प्यार नही देना चाहिए उन्हे कठोर अनुसासन में रखना चाहिए जिससे बच्चो का गोल से ध्यान न भटके। आइए अब जानते हैं कि किस उम्र के बच्चो को लाड-प्यार करना चाहिए और किस उम्र के बच्चो को कठोर अनुसासन में रखना चाहिए। और किस उम्र के बच्चो के साथ मित्र जैसा व्यवहार रखना है।
लालयेत्पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत् ।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत् ॥ ०३-१८
lālayetpañcavarṣāṇi daśavarṣāṇi tāḍayet ।
prāpte tu ṣoḍaśe varṣe putre mitravadācaret ॥ 03-18
अर्थ:- पांच साल तक पुत्र को लाड एवं प्यार से पालन करना चाहिए, दस साल तक उसे छड़ी की मार से डराए. लेकिन जब वह १६ साल का हो जाए तो उससे मित्र के समान व्यवहार करे।
इस श्लोक के अनुसार 5 साल की आयु तक के बच्चो को खूब लाड-प्यार करे। 5 से 16 साल तक बच्चो को कठोर अनुसासन में रखे। लेकिन जब बच्चा 16 साल से बड़ा हो जाए उसके साथ अनुसासन नही रखना चाहिए। क्योंकि इस उम्र के बच्चे समझदार हो जाते है।
मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः ।
मृतः स चाल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ॥ ०४-०७
mūrkhaścirāyurjāto'pi tasmājjātamṛto varaḥ ।
mṛtaḥ sa cālpaduḥkhāya yāvajjīvaṃ jaḍo dahet ॥ 04-07
अर्थ:-एक ऐसा बालक जो जन्मते वक़्त मृत था, एक मुर्ख दीर्घायु बालक से बेहतर है. पहला बालक तो एक क्षण के लिए दुःख देता है, दूसरा बालक उसके माँ बाप को जिंदगी भर दुःख की अग्नि में जलाता है।
इस श्लोक के अनुसार मूर्ख अशिक्षित बच्चे के दीर्घायु होने से बेहतर है कि माता पिता निसंतान रहे अर्थात उनके कोई बच्चा ना हो। क्योंकि मूर्ख बच्चा माता और पिता को जीवन भर दुख देता है। यहां मूर्ख से आसय पागल बच्चे से नही है बल्कि उस बच्चे से है जो अशिक्षित है उसे समाज का ज्ञान नहीं है। ऐसे बच्चे समाज को कोई भी योगदान नहीं देते और परिवार पर एक बोझ की तरह है
अब सम्मिलित रूप में इन श्लोक पर चर्चा करते है।
1- जुड़वां बच्चों के स्वभाव में अंतर होता है यह अंतर उनकी मानसिक स्थति और लालन पालन का होता है।
2 - इसीलिए माता पिता को चाहिए कि वह अपने बच्चो को योग्य अध्यापकों के पास भेजे और अच्छी संगति में रखे।
3 - बच्चें योग्य अध्यापकों की निगरानी में रहना पसंद नही करते इसीलिए उनका लालन पाला लाड-प्यार से नही बल्कि कठोर अनुशासन से करना चाहिए।
4 - आचार्य के अनुसार 5 साल की आयु तक के बच्चो को खूब लाड-प्यार करे। 5 से 16 साल तक बच्चो को कठोर अनुशासन में रखे। लेकिन जब बच्चा 16 साल से बड़ा हो जाए उसके साथ बिलकुल भी अनुशासन नही रखना चाहिए।
साथियों इसी के साथ आज की चर्चा यही समाप्त होती है। वीडियो को लेकर कोई सलाह या सुझाव हो तो कमेंट अवश्य करे। वीडियो अच्छी लगी हो तो वीडियो लाईक करे। वीडियो को शेयर करे ताकि यह वीडियो किसी जरूरत मंद के काम आ सके। आगे आने वाली वीडियो में जानेंगे कि माता पिता को अपने बच्चे को कैसी शिक्षित करना चाहिए। इसीलिए अगर आप हमारे चैनल पर पहली बार आए है तो हमारे चैनल को subscribe करके हमारे साथ जुड़ जाइए। आज की चर्चा में सामिल होने के लिए आप सभी का धन्यवाद, राधे राधे
जय श्री कृष्णा, साथियों, आशा है आप सभी कुशल मंगल से होंगे। चाणक्य नीति में इस समय हम वीडियो की सीरीज कर रहे है। इस वीडियो सीरीज में हम जानेंगे कि आचार्य चाणक्य के अनुसार माता और पिता के अपने बच्चों के प्रति क्या दायित्व है और माता और पिता को अपने दायित्वों का निर्वाहन किस प्रकार करना चाहिए। इसी सीरीज में आज की वीडियो में हम चर्चा करेंगे कि आचार्य चाणक्य के अनुसार अच्छी शिक्षा न देने वाले माता पिता अपने बच्चो के शत्रु है। तो आइए आज की वीडियो पर चर्चा प्रारंभ करते है।
सबसे पहले यह जानते है कि माता पिता के अपने बच्चो के प्रति क्या क्या दायित्व है
सुकुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत् ।
व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मेण योजयेत् ॥ ०३-०३
sukule yojayetkanyāṃ putraṃ vidyāsu yojayet ।
vyasane yojayecchatruṃ mitraṃ dharmeṇa yojayet ॥ 03-03
अर्थ:- लड़की का बयाह अच्छे खानदान मे करना चाहिए. पुत्र को अच्छी शिक्षा देनी चाहिए, शत्रु को आपत्ति और कष्टों में डालना चाहिए, एवं मित्रों को धर्म कर्म में लगाना चाहिए.
इस श्लोक के अनुसार अच्छे माता पिता को अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा देनी चाहिए तथा अपने बच्चो की शादी अच्छे खानदान में करनी चाहिए। अच्छी शिक्षा बच्चो के लिए बहुत उपयोगी है।
पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः ।
नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः ॥ ०२-१०
putrāśca vividhaiḥ śīlairniyojyāḥ satataṃ budhaiḥ ।
nītijñāḥ śīlasampannā bhavanti kulapūjitāḥ ॥ 02-10
अर्थ:- बुद्धिमान पिता को अपने पुत्रों को शुभ गुणों की सीख देनी चाहिए क्योंकि नीतिज्ञ और ज्ञानी व्यक्तियों की ही कुल में पूजा होती है।
इस श्लोक के अनुसार माता पिता को अपने बच्चो को अच्छे संस्कार और अच्छे गुणों की शिक्षा देनी चाहिए क्योंकि संस्कारी और ज्ञानी लोगो का समाज में सम्मान होता है। बिना शिक्षा के बच्चा समाज के लिए किसी काम का नही होता है।
किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गर्भिणी ।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान् न भक्तिमान् ॥ ०४-०९
kiṃ tayā kriyate dhenvā yā na dogdhrī na garbhiṇī ।
ko'rthaḥ putreṇa jātena yo na vidvān na bhaktimān ॥04-09
अर्थ:-वह गाय किस काम की जो ना तो दूध देती है ना तो बच्चे को जन्म देती है. उसी प्रकार उस बच्चे का जन्म किस काम का जो ना ही विद्वान हुआ ना ही भगवान् का भक्त हुआ.
इस श्लोक के अनुसार अगर माता पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नही देते है तो वह बच्चा समाज में कोई योगदान नहीं दे पाता। जो माता पिता अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा नही दे पाते वो समाज के लिए किसी काम के नही है।
माता शत्रुः पिता वैरी याभ्यां बाला न पाठिताः ।
सभामध्ये न शोभन्ते हंसमध्ये बको यथा ॥ ०२-११
mātā śatruḥ pitā vairī yābhyāṃ bālā na pāṭhitāḥ ।
sabhāmadhye na śobhante haṃsamadhye bako yathā ॥ 02-11
अर्थ:- जो माता व् पिता अपने बच्चों को शिक्षा नहीं देते है वो तो बच्चों के शत्रु के सामान हैं। क्योंकि वे विद्याहीन बालक विद्वानों की सभा में वैसे ही तिरस्कृत किये जाते हैं जैसे हंसो की सभा मे बगुले।
इस श्लोक के अनुसार जो माता पिता अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा नही देते वो अपने बच्चो के शत्रु के समान है। क्योंकि बच्चो को अच्छी शिक्षा न देकर बच्चो के साथ शत्रु वाला व्यवहार ही करते है क्योंकि बिना शिक्षा के व्यक्ति समाज में अपमानित किए जाते है।
अब सम्मिलित रूप में इन श्लोको से प्राप्त ज्ञान पर चर्चा करते है कि आचार्य चाणक्य इन श्लोको के माध्यम से क्या ज्ञान देना चाहते है
1- माता पिता को अपने बच्चो को अच्छे संस्कार और अच्छे गुणों की शिक्षा देनी चाहिए।
2- क्योंकि बिना अच्छी शिक्षा से बच्चे समाज में अपमानित होते है।
3 - आचार्य के अनुसार जो माता पिता अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा नही देते वो वास्तव में अपने बच्चो के शत्रु है।
4- अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कार के माध्यम से बच्चे माता पिता और पूरे कुल का मान बढ़ाते है। जिससे उनका समाज में सम्मान होता है। ऐसे बच्चे समाज के लिए मार्गदर्शक का काम करते है।
साथियों इसी के साथ आज की चर्चा यही समाप्त होती है। आज की चर्चा में सामिल होने के लिए आपका धन्यवाद। वीडियो को लेकर कोई सलाह या सुझाव हो तो कमेंट अवश्य करे। वीडियो अच्छी लगी हो तो वीडियो लाईक करे। वीडियो को शेयर करे। अगर आप हमारे चैनल पर पहली बार आए है तो हमारे चैनल को subscribe करके हमारे साथ जुड़ जाइए। जल्द ही मिलते ही अगली वीडियो में, राधे राधे
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना ।
वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा ॥ ०३-१४
ekenāpi suvṛkṣeṇa puṣpitena sugandhinā ।
vāsitaṃ tadvanaṃ sarvaṃ suputreṇa kulaṃ yathā ॥ 03-14
अर्थ:-जिस तरह सारा वन केवल एक ही पुष्प अवं सुगंध भरे वृक्ष से महक जाता है उसी तरह एक ही गुणवान पुत्र पुरे कुल का नाम बढाता है.
एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना ।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा ॥ ०३-१५
ekena śuṣkavṛkṣeṇa dahyamānena vahninā ।
dahyate tadvanaṃ sarvaṃ kuputreṇa kulaṃ yathā ॥ 03-15
अर्थ:- जंगल में आग लगने पर जैसे वहाँ का एक ही सूखा पेड़ पूरे जंगल को जलाने के लिए पर्याप्त है, उसी तरह कुटुंब को जलाने के लिए एक ही कुपूत्र काफ़ी है।
एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना ।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी ॥ ०३-१६
ekenāpi suputreṇa vidyāyuktena sādhunā ।
āhlāditaṃ kulaṃ sarvaṃ yathā candreṇa śarvarī ॥ 03-16
अर्थ:- जैसे चन्द्र के उदय होने पर रात का घनघोर अंधेरा ख़त्म हो जाता है और हर जगह सुखद चांदनी का डेरा हो जाता है, वैसे ही कुल में एक ही सुपुत्र होने से पूरे कुल की प्रतिष्ठा बढ़ जाती है और पूरा कुल प्रसन्न हो जाता है।
किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसन्तापकारकैः ।
वरमेकः कुलालम्बी यत्र विश्राम्यते कुलम् ॥ ०३-१७
kiṃ jātairbahubhiḥ putraiḥ śokasantāpakārakaiḥ ।
varamekaḥ kulālambī yatra viśrāmyate kulam ॥ 03-17
अर्थ:- ऐसे अनेक पुत्र किस काम के जो दुःख और निराशा पैदा करे. इससे तो वह एक ही पुत्र अच्छा है जो समपूणर घर को सहारा और शांति प्रदान करे.
एकोऽपि गुणवान्पुत्रो निर्गुणेन शतेन किम् ।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः ॥ ०४-०६
eko'pi guṇavānputro nirguṇena śatena kim ।
ekaścandrastamo hanti na ca tārāḥ sahasraśaḥ ॥ 04-06
अर्थ:-जिस प्रकार एक चांद ही रात्रि के अंधकार को दूर करता है, असंख्य तारे मिलकर भी रात्रि के गहन अंधकार को दूर नहीं कर सकते, उसी प्रकार एक गुणी पुत्र ही अपने कुल का नाम रोशन करता है, उसे ऊंचा उठाता है; ख्याति दिलाता है।
ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः स पिता यस्तु पोषकः ।
तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः ॥ ०२-०४
te putrā ye piturbhaktāḥ sa pitā yastu poṣakaḥ ।
tanmitraṃ yatra viśvāsaḥ sā bhāryā yatra nirvṛtiḥ ॥ 02-04
अर्थ:- पुत्र वही है जो पिता का कहना मानता हो, पिता वही है जो पुत्रों का पालन-पोषण करे, मित्र वही है जिस पर आप विश्वास कर सकते हों और पत्नी वही है जिससे सुख प्राप्त हो।
कुग्रामवासः कुलहीनसेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या ।
पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निना षट्प्रदहन्ति कायम् ॥ ०४-०८
kugrāmavāsaḥ kulahīnasevā kubhojanaṃ krodhamukhī ca bhāryā ।
putraśca mūrkho vidhavā ca kanyā vināgninā ṣaṭpradahanti kāyam ॥ 04-08
अर्थ:-निम्नलिखित बाते व्यक्ति को बिना आग के ही जलाती है… १. एक छोटे गाव में बसना जहा रहने की सुविधाए उपलब्ध नहीं. २. एक ऐसे व्यक्ति के यहाँ नौकरी करना जो नीच कुल में पैदा हुआ है. ३. अस्वास्थय्वर्धक भोजन का सेवन करना. ४. जिसकी पत्नी हरदम गुस्से में होती है. ५. जिसको मुर्ख पुत्र है. ६. जिसकी पुत्री विधवा हो गयी है.
अभ्यासाद्धार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते ।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते ॥ ०५-०८
abhyāsāddhāryate vidyā kulaṃ śīlena dhāryate ।
guṇena jñāyate tvāryaḥ kopo netreṇa gamyate ॥ 05-08
अर्थ:-निरंतर अभ्यास से विद्या की रक्षा होती हैं, सदाचार के संरक्षण से कुल का नाम उज्जवल होता हैं, गुणों के धारण करने से श्रेष्ठता का परिचय मिलता हैं तथा नेत्रों से क्रोध की जानकारी मिलती हैं।
राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः ।
भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा ॥ ०६-१०
rājā rāṣṭrakṛtaṃ pāpaṃ rājñaḥ pāpaṃ purohitaḥ ।
bhartā ca strīkṛtaṃ pāpaṃ śiṣyapāpaṃ gurustathā ॥ 06-10
अर्थ:-राजा को उसके नागरिको के पाप लगते है. राजा के यहाँ काम करने वाले पुजारी को राजा के पाप लगते है. पति को पत्नी के पाप लगते है. गुरु को उसके शिष्यों के पाप लगते है.
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च ।
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥ ०४-०१
āyuḥ karma ca vittaṃ ca vidyā nidhanameva ca ।
pañcaitāni hi sṛjyante garbhasthasyaiva dehinaḥ ॥ 04-01
अर्थ:-निम्नलिखित बातें माता के गर्भ में ही निश्चित हो जाती है….
१. व्यक्ति कितने साल जियेगा
२. वह किस प्रकार का काम करेगा
३. उसके पास कितनी संपत्ति होगी
४. उसकी मृत्यु कब होगी .