दोस्तो मैंने YouTube पर चाणक्य नीति से संबंधित कई वीडियो देखे है लेकिन ज्यादातर पर जो जानकारी दी है जो चाणक्य नीति में कही भी नही लिखी है। और उनके थंबमेल uff total click bate, जो चाणक्य जैसे महान व्यक्ति को अपमानित करने जैसा है। लेकिन मेरे चैनल पर आपको अध्याय संख्या और श्लोक संख्या के साथ सीधी और सच्ची जानकारी मिलेगी। आज इंट्रो कुछ ज्यादा ही बड़ा हो गया है। तो अब देर न करके वीडियो शुरू करते है।
आज हम बात करेंगे कि चाणक्य नीति के अनुसार दुर्जन व्यक्तियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। जैसा की हम सब जानते है कि दुर्जन व्यक्ति मानव समाज के दुश्मन होते है वो बुरे काम करते है और उन्हे इस अपराध का बिलकुल भी पछतावा नही होता है।
अज्ञानता वश कई लोग शत्रु और दुर्जन व्यक्ति को एक ही मान लेते है। जबकि दोनो अलग अलग है। आपका शत्रु दुर्जन व्यक्ति हो भीं सकता है और नही भी। हों सकता है कि कोई व्यक्ति बहुत अच्छे चरित्र का हों लेकिन परिस्थिति वश आपका शत्रु बन गया हो, जैसे महाभारत में गुरु द्रोण और भीष्म पितामह। शत्रु से हमे किस तरह का व्यवहार करना है इसके बारे में आगे आने वाली वीडियो में बात करेंगे।
1
चाणक्य नीति के अध्याय 17 श्लोक 8 के अनुसार सांप का विष उसके दांत में होता है, मक्खी का विष उसके सिर में होता है बिच्छू का विष उसके पुंछ में होता है लेकिन दुर्जन व्यक्ति के सभी अंग विष से भरे होते है।
अर्थात विषैले जानवरों का अंग विशेष में विष होता है और समय विशेष पर विष का प्रयोग करते है जबकि दुर्जन व्यक्तियों के हर अंग में विष होता है और वो हर समय समाज में जहर छोड़ते रहते है। ये समाज के लिए घातक होते है।
चाणक्य नीति के अध्याय 15 श्लोक 3 के अनुसार दुर्जन व्यक्ति और कांटे से बचने के दो उपाय है कि या तो उनसे दूर रहा जाए या फिर उनको कुचल कर उनका अस्तित्व समाप्त कर दिया जाए।
इस सिलसिले में एक आचार्य चाणक्य से जुड़ा एक प्रसंग है, यह बात उस समय की है जब सिकंदर महान अपने विश्वविजय के अभियान पर छोटे छोटे राज्यों जीत कर तेज़ी से भारत की तरफ बढ़ रहा था। उसका निशाना भारत था। इस बात की सूचना आचार्य को अपने गुप्त सूत्रों से प्राप्त हुई। आचार्य तुरंत सम्पूर्ण भारत को एक करने के अभियान पर मगध की राजधानी पाटली पुत्र की तरफ निकल पड़े। मगध उस समय भारत का सबसे बड़ा और शक्तिशाली राज्य था। पाटलिपुत्र जल्दी पहुंचने के लिए उन्होंने मुख्य मार्ग न चुन कर एक शॉर्ट कट रास्ता चुना। मार्ग में एक जगह उनके पैरों में किसी पौधे का कांटा चुभ गया। आचार्य अत्यंत क्रोधित हुए और शिष्यों को आदेश दिया कि जड़ से उखाड़ फेंको इस पौधे को। शिष्यों ने आचार्य के आदेश का पालन करते हुए उस पौधे को जड़ से उखाड़ फेंका। इस प्रसंग से आचार्य की दुर्जन व्यक्तियों के प्रति मानसिकता का पता चलता है।
अर्थात दुर्जन व्यक्तियों से बचने के सिर्फ दो ही उपाय है या तो उनसे पर्याप्त दूरी बनाया जाए। ताकि दुर्जन व्यक्तियों से कभी सामना न हो।
लेकिन परिस्थिति वश दुर्जन व्यक्ति से सामना हो जाए तो उन्हें अपने कृत्य की इतनी कड़ी सजा दी जाएं ताकि दुर्जन व्यक्ति की भविष्य में अपराध करने हिम्मत न हो। और समाज के अन्य लोगो को भी सबक मिले। ताकि कोई व्यक्ति दुबारा उस अपराध को करने का प्रयास न करे।