जय श्री कृष्णा, साथियों, आशा है आप सभी कुशल मंगल से होंगे। बसंत पंचमी के इस पावन अवसर पर हम विद्या की देवी माता सरस्वती को प्रणाम करते हुए आज की वीडियो में हम चर्चा करेंगे कि चाणक्य नीति में आचार्य चाणक्य ने विद्या के बारे में क्या कहा है और कैसे विद्या सभी धनों में सबसे श्रेष्ठ धन है। तो आइए आज की वीडियो पर चर्चा प्रारंभ करते है।
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इस धरती पर मनुष्य ईश्वर की अद्वितीय व श्रेष्ठ रचना है। साथ ही मनुष्य की महत्ता उसकी विद्या में है। मनुष्य सुंदर हो, यौवन संपन्न हो, उच्च कुल में उत्पन्न हुआ हो, परन्तु उसके पास विद्या नहीं हो तो उसकी कोई शोभा नहीं होती। जैसा कि आचार्य ने लिखा है
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धाः किंशुका यथा ॥
अर्थात सुंदर रूप वाला यौवन से युक्त ऊंचे कुल में उत्पन्न होने पर भी विद्या से हीन व्यक्ति मनुष्य सुगंध रहित ढाक अथवा टेसू के फूल की भांति उपेक्षित रहता है। प्रसंसा को प्राप्त नहीं होता है।
विद्या का अर्थ ज्ञान और शिक्षा से है। जिस साधन द्वारा मनुष्य कुछ जानता है, सीखता है, उसे विद्या कहते हैं। विद्या कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे गुरु अपने हाथो से किसी के हाथों में दे दे। यहां तक कि गुरु चाह कर भी ऐसा नही कर सकते। विद्या प्राप्त करने के लिए निरंतर अध्ययन करना होता है। जिस प्रकार डॉक्टर के द्वारा दी गई दवा को उसके डोज के अनुसार खाना चाहिए क्योंकि अगर सारी दवा एक साथ ले लेंगे तो दवा फायदा करने कि बजाय नुकसान कर देगी। उसी तरह ज्ञान को धीरे एकत्र करना चाहिए इससे ज्ञान स्थाई होता है। विद्या एक दिन में पाई नहीं जा सकती इसके लिए वर्षों तक परिश्रम करना पड़ता है जैसा कि चाणक्य ने अपनी पुस्तक चाणक्य नीति में लिखा है।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥
अर्थात जैसे बूंद-बूंद से घड़ा भर जाता है, उसी प्रकार निरंतर इकट्ठा करते रहने से धन,
विद्या और धर्म की प्राप्ति होती है। ।।
विद्या के अनेक रूप है। जैसे जिस विद्या के द्वारा मनुष्य को औषिधियों के गुण, दोष और शरीर पर उसके प्रभाव का ज्ञान होता है, उसे आयुर्वेद विद्या कहते हैं। तो वहीं जिससे पृथ्वी, नदी, सागर आदि का ज्ञान होता है, उसे भूगोल विद्या कहते है। जिससे विविध नक्षत्रों, तारा गणों और उनके प्रभाव का ज्ञान होता है,उसे नक्षत्र विद्या या ज्योतिष विद्या कहते हैं। धर्म और कर्तव्य संबंधी विद्या वेद विद्या हुई। मन को आनंद देने के साथ ही शिक्षा देने वाली विद्या साहित्य हुई। युद्ध नीति और शस्त्र का ज्ञान सैन्य शिक्षा में करते है। इसी प्रकार भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान आदि भी विज्ञान, शास्त्र और विधाएं हैं। उक्त सभी विद्याओं का ज्ञान एक ही व्यक्ति को नहीं हो सकता लेकिन जो इनमें से एक, दो या चार विद्या भी जानता है, वह विद्वान कहलाता है। विद्या हर सफर में व्यक्ति का सच्चा मित्र है जैसा कि आचार्य ने लिखा है
विद्या मित्रं प्रवासे च भार्या मित्रं गृहेषु च ।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च ॥ १२-१७
अर्थ:- विद्या सफ़र में हमारा मित्र है. पत्नी घर पर मित्र है. औषधि रुग्ण व्यक्ति की मित्र है. मरते वक्त तो पुण्य कर्म ही मित्र है.
विद्या एक ऐसा धन है जिसे चोर चुरा नहीं सकते, राजा छीन नहीं सकता, भाई बांट नहीं सकते और यह व्यय करने पर बढ़ती है। जहां एक ओर रुपया पैसा अन्न आदि ऐसे पदार्थ है जो खर्च करने पर घटते हैं किन्तु विद्या रूपी धन ऐसा है जो खर्च करने पर बढ़ता है। इसीलिए गुरु को भी किसी पात्र व्यक्ति को विद्या देने से मना नहीं करना चाहिए क्योंकि विद्या का दान करने से ज्ञान बढ़ता है और जरूरत पड़ने पर काम आता है जैसा कि आचार्य लिखते है।
पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनं ।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥ १६-२०
अर्थात जिसका ज्ञान किताबो में सिमट गया है और जिसने अपनी दौलत दुसरो के सुपुर्द कर दी है वह जरुरत आने पर ज्ञान या दौलत कुछ भी इस्तमाल नहीं कर सकता.
विद्या के बल पर ही तो मनुष्य संसार का इतना विकास कर पाया है। ऐसे में हमें जो दिन प्रतिदिन नए आविष्कार अपने आस पास दिखाई दे रहे हैं, अनन्त वैभव दिखाई दे रहा है, उसके मूल में विद्या ही है लेकिन यह भी सत्य है कि विद्या बिना कष्ट के नहीं मिलती है। विद्या प्राप्ति के लिए सारे सुख त्यागने पड़ते हैं, तपस्या करनी पड़ती है, सुख की कामना करके कोई विद्या नहीं पा सकता है। जैसा कि आचार्य ने लिखा है
कामक्रोधौ तथा लोभं स्वादुशृङ्गारकौतुके ।
अतिनिद्रातिसेवे च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत् ॥ ११-१०
अर्थात विद्यार्थी के लिए आवश्यक है वह काम, क्रोध, लोभ, स्वादिष्ट पदार्थों की ईच्छा,
श्रृंगार, खेल-तमाशे, अधिक सोना और चापलूसी करना आदि इन 8 चीजों का परित्याग कर दे।।
वैसे तो विद्या के अनेक गुण है लेकिन उसका प्रमुख गुण है योग्यता का विस्तार करना। इतना ही नहीं विद्या का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। मनुष्य का रूप, धन, यश, सुख और सम्मान विद्या में निहित है। ऐसे में एक विद्वान मनुष्य ही समाज में उच्च स्थान और सुख प्राप्त करता है। साथ ही राजा का मान अपने ही देश में होता ही लेकिन एक विद्वान व्यक्ति सर्वस्व पूजा जाता है। जैसा कि आचार्य ने कहा है
विद्वान्प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ।
विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते ॥ ०८-२०
अर्थ:-विद्वान् व्यक्ति लोगो से सम्मान पाता है. विद्वान् उसकी विद्वत्ता के लिए हर जगह सम्मान पाता है. यह बिलकुल सच है की विद्या हर जगह सम्मानित है.
विद्या से ही मनुष्य में नम्रता आती है। नम्रता से योग्यता आती है। योग्यता से मनुष्य धन कमाता है। धन से वह धर्म और कर्तव्य का आचरण करता है और धर्म के आचरण से सुख की प्राप्ति होती है। इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य को विद्या प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। विद्या प्राप्ति के लिए नम्रता और साधना आवश्यक गुण है। ऐसे में विद्या कहीं से मिले, उसे अवश्य ही ग्रहण करना चाहिए। विद्या के अर्जन करने में शर्म नहीं करना चाहिए जैसा कि आचार्य ने लिखा है
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासङ्ग्रहणे तथा ।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत् ॥ १२-२१
अर्थ:- जिसे दौलत, अनाज और विद्या अर्जित करने में और भोजन करने में शर्म नहीं आती वह सुखी रहता है।
विद्या गुरुजनों की सेवा से, अत्यधिक धन से या एक विद्या देकर बदले में दूसरी विद्या देने से मिलती है । यदि मनुष्य के पास विद्या है, तो वह कभी भी भूखा नहीं रह सकता है। साथ ही हमें मान, प्रतिष्ठा, यश, और लक्ष्मी देने वाली विद्या की आराधना में निरंतर तत्पर रहना चाहिए।
जैसे पुष्प की शोभा सुगंध से होती है, उसी प्रकार मनुष्य की शोभा विद्या के अर्जन में है। इसीलिए हम कह सकते हैं कि विद्या सभी धनों में सबसे श्रेष्ठ है।
इसी के साथ आज चर्चा यही समाप्त होती है वीडियो या चैनल के लिए कोई सलाह , सुझाव यहां तक कि कोई शिकायत भी हो तो भी कमेंट करे ताकि हम अपने वीडियो में सुधार कर सके। आपका एक एक कमेन्ट हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर वीडियो अच्छी लगी हो तो Like कर हमे प्रोत्साहित करे। वीडियो को शेयर करे ताकि अन्य लोग भी इस वीडियो का लाभ उठा सके। राधे राधे
शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना ।
न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे ॥ ०७-१९
अर्थ:-एक अनपढ़ आदमी की जिंदगी किसी कुत्ते की पूछ की तरह बेकार है. उससे ना उसकी इज्जत ही ढकती है और ना ही कीड़े मक्खियों को भागने के काम आती है.