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चाणक्य नीति के अनुसार गुरु ऋण से कैसे मुक्त हो सकते है?



साथियों, सबसे पहले आप सभी को शिक्षक दिवस एवम भारत के पहले उपराष्ट्रपति और शिक्षाविद सर्व पल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। एक गुरु के बारे में मैं क्या बताऊं जिसके ऊपर लाखो पुस्तके लिखी जा चुकी है। इसीलिए एक गुरु और एक शिक्षक के बारे में उस व्यक्ति की पुस्तक से जानते जो swam me एक महान शिक्षक और एक महान गुरु है। आइए जानते है कि आचार्य चाणक्य ने अपनी पुस्तक चाणक्य नीति में गुरु की महिमा के बारे में क्या लिखा है। 

नमस्कार साथियों,आपका स्वागत है गुरूंजी की क्लास life Lessons by Guruji में,गुरु जी की क्लास में आपको जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए अनमोल ज्ञान दिया जाता है। इस अनमोल ज्ञान को ढूंढने के लिए हमारी टीम बहुत मेहनत करती है इसीलिए video को लाइक और शेयर कर हमारी टीम का मनोबल बढ़ाए। 
महत्वपूर्ण बात यह हैं कि वीडियो को आधा अधूरा छोड़ कर न जाए क्योंकि आधा अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है आधे अधूरे ज्ञान के कारण ही वीर अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस गया था। अंत में गुरु जी की क्लास में पहली बार आए है तो चैनल को सब्सक्राइब कर दे। ताकि आपसे कभी क्लास मिस न हो। तो चलिए वीडियो शुरू करते है। 

चाणक्य नीति के अध्याय 17 श्लोक 1 के अनुसार  जिन व्यक्तियों ने गुरु के पास बैठ कर शिक्षा प्राप्त नहीं की है बल्कि पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त किया है। वह व्यक्ति विद्वान लोगो की सभा में उसी तरह  सम्मान नही होता। जिस प्रकार अनैतिक संबंधों से गर्भ धारण करने वाली स्त्री का समाज में सम्मान नही प्राप्त होता है।   

आचार्य ने शिक्षक के बिना किताबी ज्ञान को अधूरा माना है आचार्य का  मानना है कि गुरु के समीप रह कर ही योग्य  शिक्षा पाई जा सकती है। आचार्य का  मानना है कि पुस्तक में कई बाते ऐसी होती है जो शिष्य को समझ में नहीं आती तो गुरु तुरंत उस बात को शिष्य को समझा  है कर शिष्य की शंका का समाधान कर देता है। यही कारण है कि शिष्य को जो ज्ञान गुरु से प्राप्त होता है वह अपने आप सम्पूर्ण होता है।  

 बिना गुरु के प्राप्त ज्ञान आधा अधूरा रहता है। और आधा अधूरा ज्ञान समाज के लिए खतरनाक होता है। ऐसे व्यक्ति समाज में उपहास का पात्र बनते है और अपने ज्ञान का अपमान करवाते है।

आचार्य चाणक्य खुद तकशीला विश्विद्यालय के नियमित शिक्षक रहे है। इसीलिए आचार्य विद्यालय की शिक्षा का महत्व जानते है। अपनी पुस्तक में आचार्य ने अन्य प्रकार के गुरु के बारे में बताया  है।

चाणक्य नीति के अध्याय 15 श्लोक 2 के अनुसार जो गुरु अपने शिष्य को एक अक्षर का ज्ञान करवा देता है उस गुरु के ऋण से शिष्य कभी मुक्त नहीं हो पाते। संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जिसे शिष्य गुरु को समर्पित करके अपने ऋण से मुक्त हो सके।  

आचार्य ने अपने श्लोक में एक अक्षर ज्ञान के महिमा का बखान किया है। लेकिन एक अक्षर के ज्ञान के बारे में न तो चाणक्य नीति न ही किसी अन्य पुस्तक में कुछ लिखा है। एक अक्षर ज्ञान के बारे में 2 मत है।

पहला मत एक अक्षर अर्थात ॐ। ॐ को स्वम् परमेश्वर माना गया है। और जो गुरु परमेश्वर का ज्ञान करवा दे आखिर कोई उसके ऋण से कैसे मुक्त हो सकता है। ऐसे गुरु के बारे में कबीर दास जी लिखते है 

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।

अर्थात जो गुरु आपको परमेश्वर का ज्ञान करा दे वह स्वम परमेश्वर से बड़ा हो गया। कोई ऐसे गुरु ऋण नहीं चुका सकता है।

दूसरे मत एक अक्षर अर्थात वर्णमाला ज्ञान - आपको याद है कि आपको क से कबूतर किसने पढ़ाया था। याद कीजिए याद आया,  हा आपकी मां ने। मां जिसे दुनिया , पहला गुरु मानती है।  मां और पिता की महानता के बारे में में मैं क्या बताऊं। यह बात सबको पता है। क्या कोई इस जीवन में अपने मां और पिता के ऋण से मुक्त हो सकता है।

आचार्य में अपनी पुस्तक में चाणक्य नीति में लिखा है कि ऐसे माता पिता अपने बच्चो के शत्रु है जो बच्चो को अच्छी शिक्षा नही देते। 

कई लोग अज्ञानता वश शिक्षक और गुरु दोनो को एक ही मान लेते है। शिक्षक आपको नियमित शिक्षा देता है। जैसे आपके विद्यालय के शिक्षक। लेकिन गुरु आपको सांसारिक समस्या से मुक्ति का रास्ता दिखाता है। जैसे की मैं। सॉरी सॉरी सॉरी जैसे कि मैं जिन पुस्तकों के माध्यम से आपको सांसारिक समस्या से मुक्ति का मार्ग बताता हूं। इसीलिए पुस्तके भी आपकी गुरु हुई।

अंत में संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे देकर आप अपने गुरु के ऋण से मुक्त हो सके। गुरु को गुरु दक्षिणा में सम्मान दीजिए यही गुरु के लिए सच्ची गुरु दक्षिणा है।