नमस्कार साथियों, आप सभी को दशहरा उत्सव की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। जैसा की आप सब जानते है कि दशहरा उत्सव अपने शत्रुओं पर विजय पाने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है । इसी कारण इस पावन अवसर पर आज हम चर्चा करेंगे कि आचार्य चाणक्य ने शत्रु पर विजय पाने के लिए कॉन सी नीतियां बताई है। आचार्य चाणक्य को खुद भी शत्रु पर विजय पाने के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। चाणक्य एक गरीब ब्राह्मण और साधारण अध्यापक होते हुए भी भारत के सबसे शक्तिशाली शासक धनानंद को भरे दरबार में चुनौती देकर हराया था। उस धनानंद के बारे में यह जानकारी भी महत्वपूर्ण है कि धनानंद की शक्ति से घबकर विश्व विजय के अभियान पर निकले सिकंदर की सेना वापस लौट गई थी। यहीं कारण चाणक्य की नीतियां हमारे लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। आइए जानते है कि चाणक्य ने शत्रुओ पर विजय पाने के लिए कौन सी नीतियां बताई है।
इंट्रो
चाणक्य के अनुसार हमे किसी से बैर भाव या द्वेष नहीं रखना चाहिए क्योंकि द्वेष से हम अपना ही नुकसान करते है। चाणक्य ने हमे बताया है कि हमे किस से द्वेष नहीं रखना चाहिए।
चाणक्य नीति के अध्याय 10 श्लोक 11 के अनुसार, जो मनुष्य अपनी ही आत्मा से द्वेष रखता है वह स्व को नष्ट कर लेता है। दूसरो से द्वेष रखने से अपना धन नष्ट होता है। राजा से वैर-भाव रखने से मनुष्य अपना नाश करता है और ब्राह्मणों से द्वेष रखने से कुल का नाश हो जाता है।
चाणक्य नीति के अनुसार जो व्यक्ति अपनी आत्मा की बात नहीं सुनता वो व्यक्ति अपने को और अपनी कीर्ति दोनो को नष्ट कर लेता है।
जो व्यक्ति अन्य दूसरे व्यक्ति से द्वेष रखता है वो अपना धन नष्ट करता है क्योंकि लड़ाई झगड़े और कोर्ट कचहरी में अपना समय और पैसा दोनो व्यय होता है।
इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने राजा से द्वेष रखता है वो अपना नाश करवा लेता है क्योंकि राजा उस व्यक्ति से बहुत शक्तिशाली होता है। आपने वह कहावत तो सुनी ही होगी कि जल में रहकर मगर से बैर नहीं लेना चाहिए।
लेकिन सबसे बुरी स्थिति तब होती है जब व्यक्ति ब्राह्मणों या विद्वानों से द्वेष रखता है वो अपने समस्त कुल का नाश करवा देता है। क्योंकि अगर विद्वान से द्वेष रखेगा तो विद्वान उस व्यक्ति और उसके परिवार को अच्छी शिक्षा नहीं देंगे अच्छी शिक्षा न मिलने के कारण उस व्यक्ति के कुल का ही नाश हों जाएगा। इसीलिए किसी से द्वेष या बैर नहीं रखना चाहिए।
लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियां हो जाती है कि आप किसी से बैर या द्वेष भी रखना नही चाहते फिर भी कुछ लोग आपके शत्रु बन जाता है क्योंकि चाणक्य के अनुसार कुछ लोग हमेशा शत्रु ही रहते है। जैसा कि इस श्लोक में स्पष्ट हो जाता है।
चाणक्य नीति के अध्याय 10 श्लोक 6 के अनुसार, मांगने वाला लोभी मनुष्य का शत्रु होता है। मूर्खो का शत्रु उपदेश देने वाला
होता है। व्यभारिणी स्त्री का शत्रु उनका पति होता है और चोर का शत्रु चांद होता है।
चाणक्य के अनुसार कुछ लोग कर्मो के कारण ही दूसरो के शत्रु बन जाते है जैसे
लालची व्यक्ति किसी को कुछ देना नही चाहता इसिलियें जो व्यक्ति लालची व्यक्ति से कुछ मांगने आता है वह व्यक्ति लालची व्यक्ति का शत्रु बन जाता है।
मूर्ख व्यक्ति किसी की बात नहीं सुनते इसीलिए जो व्यक्ति मूर्ख व्यक्ति को उपदेश देता है वो व्यक्ति मूर्ख व्यक्ति का शत्रु बन जाता है। इसीलिए विद्वान व्यक्ति को चाहिए कि वो मूर्ख व्यक्ति को सलाह या उपदेश न दे।
इसी प्रकार जो स्त्री दूसरे पुरुष से अनैतिक संबंध बनाती है ऐसी स्त्री का शत्रु खुद उनका पति होता है। इसी तरह जो पुरुष दूसरी महिला से अनैतिक संबंध बनाता है ऐसे पुरुष की शत्रु खुद उसकी पत्नी होती है। अतः ऐसी स्त्री के पति और पुरुष की पत्नी को सदैव सावधान रहना चाहिए।
चोर अंधेरी काली रात में चोरी करना पसंद करते है ऐसे में चांद न चाहते हुए भी चोरों का शत्रु बन जाता है।
चाणक्य ने शत्रु को पहचाने के बाद शत्रु पर विजय पाने की बहुत कारगर नीति बनाई है यह नीति जितनी कारगर 2500 वर्ष पूर्व थी आज भी उतनी ही करकर है।
चाणक्य ने तीन तरह के शत्रु की बात की है और यह बताया है कि इन पर कैसे विजय पाया जाए।
जो शत्रु आपसे बलवान हो उसके साथ अनुकूल व्यवहार करना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों से ऐसा व्यवहार करे जो इस तरह के शत्रु को प्रसन्न कर सके जिससे इनके साथ जल्द से जल्द द्वेष खतम हो और वह बलवान व्यक्ति आपका मित्र बन जाए।
जो शत्रु दुष्ट प्रवृति का हो उसके साथ प्रतिकूल व्यवहार करना चाहिए। इन्हे बलपूर्वक या जैसे भी संभव हो कुचल कर नष्ट कर देना चाहिए। जिससे अन्य व्यक्तियों को सबक मिले और कोई भीं आपका शत्रु बनने की हिम्मत न कर सके।
अंत में जो शत्रु आपके समान बलवान हो उसके साथ शत्रु के चरित्र और समय के अनुसार विनम्रता से या बलपूर्वक जिस व्यवहार से वह शत्रु आपके वश में आता है उसे वश में करना चाहिए।
इस श्लोक में एक छुपी हुई बात है कि हम शत्रु के साथ सुसंगत व्यवहार तब ही कर पाएंगे जब हम शत्रु के बारे में पूरी तरह जानेंगे। इसीलिए शत्रु के साथ सुसंगत व्यवहार करने से पहले उसके बारे में ठीक से जानकारी कर ले कि शत्रु का चरित्र कैसा है वह कितना बलवान है। और वह आपका नुकसान किस तरह से और कितना कर सकता है। आधे अधूरी जानकारी से उठाया गया कोई भी कदम खतरनाक हो सकता है।
साथियों आज की वीडियो यही समाप्त हुई भगवान राम से यही प्रार्थना है कि भगवान सभी के शत्रुओं को समाप्त कर, सभी का जीवन सुखमय बनाए।
धन्यवाद