नमस्कार साथियों,
हमारी इच्छाएं ही हमारे दुख और पाप का कारण है इच्छाएं अनंत होती है जब एक इच्छा पूरी होती है तो कई अन्य इच्छाएं जन्म ले लेती है ये इच्छाएं कई बार मनुष्य पाप कर्म करने पे मजबूर कर देती है। भगवद गीता के अध्याय 3 में भगवान श्री कृष्ण ने बताया है कि कैसे मनुष्य अपनी इच्छाओं पर काबू करके पाप कर्म करने से बच सकता है। आइए भगवान श्री कृष्ण का नाम लेकर आज की वीडियो शुरू करते है।
मनुष्य कई बार मजबूरी वश अपने इंद्रियों को तो वश में कर लेता है लेकिन अपनी इच्छाओं को काबू में नहीं कर पाता है । मैं आपको इसके दो उदाहरण बताऊंगा।
उदाहरण 1 जैसे कोई मनुष्य अपने ससुराल के पार्टी में गया वहा पर उसकी साली अपनी सहेलियों के डांस कर रहीं थी। अब उस मनुष्य की इच्छा भी डांस करने की हुई लेकिन पत्नी और समाज में डर से उस मनुष्य ने अपनी इंद्रियों को वश में रखा । लेकिन इच्छाओं का क्या उस मनुष्य की इच्छाएं बार बार साली के साथ डांस करने के लिए आतुर थी।
उदाहरण 2 - जैसे कोई मनुष्य किसी पार्टी में गया पार्टी में कई तरह के व्यंजन रखे थे। Us मनुष्य का मन बहुत सारे रसगुल्ले खाने का था लेकिन शुगर की बीमारी और समाज को देखते उस मनुष्य ने अपनी इंद्रियों को वश में रखा और उसने सिर्फ 1 रसगुल्ला अपनी प्लेट में रखा। लेकिन ईच्छाये उसके वश में नहीं थी और उस मनुष्य की निगाह रसगुल्ले पर थी।
मैंने सिर्फ 2 उदाहरण दिए ऐसे हजारों उदाहरण है । आपको क्या लगता है क्या ऐसे लोगो को अपने कर्मो का उचित फल मिलेगा । बिलकुल भीं नही। I ऐसे लोग मित्थाचारी या झूठे है। और स्वयं को धोखा दे रहे है। इसी कारण इन्हे अपने अच्छे कर्मों का फल नहीं मिल पाता है। और ऐसे लोग दुखी रहते है।
आपने समाज में कई लोगो को देखा होगा जो भगवा वस्त्र पहनते है और भांति भांति से भगवान को पूजने है। लेकिन उसके बावजूद वह दुखी रहते है। ऐसा क्यों क्योंकि समाज को दिखाने के लिए मजबूरी वश इन्होंने अपनी इंद्रियों को तो वश में कर लिया है लेकिन उनकी इच्छाएं उनके वश में नहीं है।
मेरी पिछली वीडियो पर एक कमेंट आया था कि अगर मनुष्य अपनी इच्छाओं को वश में कर ले तो वह भगवान बन जाए। बात बिलकुल सही है। भगवान हमारे आपके के बीच के लोग होते है जो अपने अच्छे कर्मों से भगवान बन जाते है जैसे भगवान राम और भगवान कृष्ण। इस बात को हम अर्जुन के इस प्रश्न से जोड़ सकते है।
जब अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि जब मनुष्य भगवान का ही अंश है तो मनुष्य से पाप क्यों होते है। इस पर भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि रजोगुण से उत्पन काम और क्रोध महा पापी है। काम और क्रोध के कारण ही मनुष्य अपने इच्छाओं को अपने वश में नहीं कर पाता है। जिस प्रकार धुआ आग को ढक लेता है धूल आईने को ढक लेती है उसी प्रकार काम और क्रोध मनुष्य की बुद्धि को ढक लेते है और यहीं काम और क्रोध मनुष्य से पाप कर्म करवाते है।
भगवान ने बताया कि मनुष्य के शरीर से शक्तिशाली इंद्रियां है इंद्रियों से शक्तिशाली मन है मन से शक्तिशाली बुद्धि है और बुद्धि से शक्तिशाली है परम शक्ति आत्मा। इसीलिए अर्जुन तू आत्मा से बुद्धि को वश में कर बुद्धि मन को वश में करेगी मन इंद्रियों को वश में करेगा और इंद्रियां शरीर को वश में करेंगी। इस तरह से इच्छाएं वश में आ जायेंगी। भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि जो मनुष्य बुद्धि के द्वारा अपनी इच्छाओं को वश में करता है और बिना ईच्छा बिना मोह के अपना कर्म करता है वही श्रेष्ठ मनुष्य कहलाता है।
अब भगवान श्री कृष्ण के उपदेश को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझते है कि हमे सबसे पहले अपनी बुद्धि को पवित्र करना चाहिए जब बुद्धि पवित्र हों जाएगी तो मन में अच्छे विचार आयेंगे । अच्छे विचारों से हम हम अपनी फालतू की इच्छाओं को वश में कर लेंगे। जब इच्छाएं वश में होंगी तो हमसे बुरे काम नही होंगे। और हम श्रेष्ठ मनुष्य बन जायेंगे।
धन्यवाद
निष्काम कर्म से परमात्मा को प्राप्त करे
नमस्कार साथियों, आपका स्वागत है Life Lessons के माध्यम से अपने जीवन यात्रा को सफल और सुगम बनाने वाले अभियान में।
वीडियो में हमने जाना था कि मनुष्य कैसे अपनी इच्छाओ को अपने वश में कर के श्रेष्ठ मनुष्य बन सकता है। लेकिन प्रश्न उठता है कि इच्छाएं ही नही होगी तो मनुष्य संसार में किस उद्देश्य से कर्म करेगा। अपने इस प्रश्न का उत्तर स्वयं भगवान से ही लेते है और जानते है भगवान श्री कृष्ण ने किस प्रकार और किस उद्देश्य से कर्म करने की बात की है। और यह बताया कि कैसे निष्काम कर्म से परमात्मा की प्राप्ति होती है। चलिए आज की चर्चा प्रारंभ करते है।
भगवद गीता के अब तक के सीरीज में आपने जाना कि अर्जुन का दुख तो बहुत कम हो गया है लेकिन अब वह बड़े असमंजस में है और समझ नही पा रहे है कि उन्हें आगे क्या करना चाहिए। इसी असमंजस भाव से भगवान से कहते है कि हे केशव मैं बड़ी दुविधा में हू। एक तरफ आप कहते है कि हमे अपने बुद्धि के द्वारा इंद्रियों को वश में कर इच्छाओ को त्याग देना चाहिए और दूसरी तरह मुझे राज्य की इच्छा कर अपनों से ही युद्ध करने के लिए प्रेरित कर रहे है। हे जनार्दन कृपया स्पष्ट रूप से मेरा मार्गदर्शन कीजिए कि मुझे क्या करना चाहिए।
इसके बाद भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते है कि आत्म सिद्धि को प्राप्त करने के दो मार्ग है।
- कुछ लोग अपनी इंद्रियों को वश में करके ध्यान और भक्ति के द्वारा आत्म सिद्धि को प्राप्त करने का प्रयास करते है।
- और कुछ लोग अपनी इंद्रियों को वश में करके बिना फल की इच्छा के निष्काम कर्म के द्वारा आत्मसिद्धि को प्राप्त करने का प्रयास करते है।
लेकिन हे पार्थ यह संभव ही नहीं कि कोई भी मनुष्य बिना कर्म किए आत्मसिद्धि को प्राप्त नहीं कर सके। क्योंकि प्रकृति में सभी वस्तुएं चलाय मान है अर्थात प्रकृति कभी नहीं रुकती। इसीलिए जब तक जीवन है तब तक कर्म करना ही पड़ता है। क्योंकि जब हम कर्म नहीं करते तब भी हम कर्म ही कर रहे होते है। जो मनुष्य इस लोक अपने निहित कर्तव्यों के अनुसार अपना कर्म नहीं करता वह पापी मनुष्य इस लोक में व्यर्थ ही जीता है।
इसीलिए आवश्यक है कि पहले कर्म को समझा जाए और समझ कर कर्म किया जाए। श्रेष्ठ मनुष्य जैसा आचरण करता है अन्य लोग भी वैसा ही आचरण करने लगते है। इसीलिए भले ही संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जिसे मैं पा न सकू । फिर भी लोगो को प्रेरित करने के लिए मुझे भी कर्म करना पड़ता है। इसीलिए मैं बार बार अवतार लेकर लोगो को कर्म करने का सही मार्ग बताता हू।
अहंकार से वशीभूत होकर मूर्ख मनुष्य स्वयं को कर्ता समझ कर कर्म करता है। वह सोचता है कि यह कार्य करने से उन्हें अमुक फल प्राप्त होगा। वह अपनी स्थति को नही समझता कि संपूर्ण प्रकृति में उसकी क्या स्थति है। वास्तविक कर्ता तो सिर्फ प्रकृति है। मनुष्य का अधिकार तो सिर्फ कर्म पर है फल तो प्रकृति पर निर्भर करता है।
अतः मनुष्य को अपने इंद्रियों को वश में करके इच्छाओं को त्याग कर निष्काम भाव से नियत कर्म करना चाहिए । हे पार्थ अनाासक्त हो कर निष्काम भाव से कर्म करने से ही परमाात्मा की प्राप्ति होती है।
अब आधुनिक परिप्रेक्ष्य में बात करे तो हमे सबसे पहले अपना गोल निश्चित करना चाहिए और उसके बाद अपना सारा फोकस उस गोल पर लगाकर काम करना चाहिए। और काम करने से जो रिजल्ट आपको मिले उसमे संतुष्ट होकर फिर अगला गोल निश्चित करना चाहिए। इस तरह से कर्म करने से आप अपने उद्देश्य में सफल होकर अपने जीवन को सफल बना पाएंगे।
मेरी पिछली वीडियो पर एक कमेंट आया है कि मैं अपने संबोधन में साथी शब्द का प्रयोग क्यों करता हूं। जबकि अन्य लोग दोस्त फ्रेंड्स या अन्य दूसरे शब्दो का प्रयोग करते है तो साथियों इसका भी कारण है, आप सभी जानते है कि साथी शब्द का अर्थ होता है कि किसी काम को एक साथ करने वाले लोग। जैसे आपकी पत्नि या आपको पति आपका साथी है। मैं मानता हूं कि यह जीवन जो हमे मिला है वह एक यात्रा है और हम सभीं लोग इस सफर में हम सफर है या साथी है। और अपनी इसी जीवन यात्रा सुगम और सफल बनाने के लिए मैं life Lessons का सहारा लेता हू और आप सभी साथियों को शेयर करता हूं। तो आप सभी साथी लाईफ lessons को दूसरे साथी के सााथ शेयर करें जिस से वही स भी अपनी जीीवन को सफल बना सके।
धन्यवाद