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चाणक्य नीति मित्र


जय श्री कृष्णा, साथियों, आशा है आप सभी कुशल मंगल से होंगे। चाणक्य नीति में आज की वीडियो में हम चर्चा करेंगे कि आचार्य चाणक्य के अनुसार मित्रता क्या है मित्रता का हमारे जीवन में क्या महत्व है  आइए आज की वीडियो पर चर्चा प्रारंभ करते है। 


व्यक्ति को प्रत्येक रिश्ता उसके अपने जन्म से ही प्राप्त होता है,  पर मित्रता ही एक ऐसा रिश्ता है जिसका चुनाव व्यक्ति स्वयं करता है। सच्ची मित्रता रंग-रूप नहीं देखती, जात-पात नहीं देखती, ऊँच-नीच, अमीरी-गरीबी तथा किसी प्रकार के किसी भी भेद-भाव का खंडन करती है। मित्रता किसी भी उम्र में और किसी के साथ भी हो सकती है। मित्रता के लिए सबसे आवश्यक चीज है विश्वास। अगर आपस में विश्वास नहीं है तो यहां मित्रता नहीं हो सकती। जैसा कि आचार्य ने कहा है


ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः स पिता यस्तु पोषकः ।

तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः ॥ ०२-०४


अर्थ:- पुत्र वही है जो पिता का कहना मानता हो, पिता वही है जो पुत्रों का पालन-पोषण करे, मित्र वही है जिस पर आप विश्वास कर सकते हों और पत्नी वही है जिससे सुख प्राप्त हो।


व्यक्ति का सच्चा मित्र ही उसके प्रत्येक राज़ को जानता है। पुस्तक ज्ञान की कुंजी है, तो एक अच्छा मित्र पूरा पुस्तकालय, जो हमें समय-समय पर जीवन के कठिनाईयों से लड़ने में सहायता प्रदान करते है। सच्ची मित्रता व्यक्ति को सदैव सही मार्ग दिखाती है। जैसा कि आचार्य चाणक्य ने बताया है 


आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसङ्कटे ।

राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥ ०१-१२

अर्थ:- अच्छा मित्र वही है जो हमे निम्नलिखित परिस्थितियों में नहीं त्यागे:

आवश्यकता पड़ने पर, 

किसी दुर्घटना पड़ने पर, 

जब अकाल पड़ा हो, 

जब युद्ध चल रहा हो, 

जब हमे राजा के दरबार मे जाना पड़े अर्थात आधुनिक समय में कोर्ट कचहरी का सामना करना पड़े

या जब हमे समशान घाट जाना पड़े।


व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में दोस्तों की मुख्य भुमिका होती है। ऐसा कहा जाता है की व्यक्ति स्वयं जैसा होता है वह अपने जीवन में दोस्त भी वैसा ही चुनता है। इसीलिए समाज आपकी परख आपके दोस्तों से करता है। क्योंकि बुरे दोस्त के साथ रहने पर आपका विनाश निश्चित है जैसा कि आचार्य ने कहा है

दुराचारी दुरादृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः ।

यन्मैत्री क्रियते पुंभिर्नरः शीघ्रं विनश्यति ॥ ०२-१९

अर्थ:- जो व्यक्ति दुराचारी, कुदृष्टि वाले, एवं बुरे स्थान पर रहने वाले मनुष्य के साथ मित्रता करता है, वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।

जहां लोग आपसे बात भी अपने स्वार्थ सिद्धि के मनोकामना से करते हैं ऐसे में सच्ची मित्रता भी बहुत कम लोगों को प्राप्त हो पाती है। प्राचीन समय से ही लोग अपनी इच्छाओं व अकांक्षाओं की पूर्ति के लिए दोस्ती करते हैं तथा अपना कार्य हो जाने पर अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं। व्यक्ति को दोस्ती का हाथ हमेशा सोच समझ कर अन्य की ओर बढ़ाना चाहिए। 


व्यक्ति के घर से निकलने पर उसकी पहली आवश्यकता मित्र होते हैं।  इसीलिए व्यक्ति मित्र बनाने की होड़ में लग जाता है, पर यह कितनी गंभीर बात है हम अपने लिए कोई जानवर भी लाते है तो अनेक तहक़ीक़ात कर के लाते हैं। पर हम मित्र बनाने में इतना समय नहीं लगाते जबकि मित्रता व्यक्ति का पतन भी करा सकती है। और व्यक्ति को कामयाबी के उच्च शिखर तक भी पहुंचा सकती है। इसीलिए हमे अच्छे मित्रो का चयन करना चाहिए अब आपका मित्र  अच्छा है या बुरा इसके समय समय पर अपने मित्रों और करीबियों को परखते रहना चाहिए ताकि हमें अच्छे और बुरे मित्र के बारे में पता रहे। यही बात आचार्य ने अपनी चाणक्य नीति में कही है।

जानीयात्प्रेषणे भृत्यान्बान्धवान् व्यसनागमे ।

मित्रं चापत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥ ०१-११

अर्थ:- नौकर की परीक्षा तब करें जब वह कर्त्तव्य का पालन न कर रहा हो, रिश्तेदार की परीक्षा तब करें जब आप मुसीबत मे घिरें हों, मित्र की परीक्षा विपरीत परिस्थितियों मे करें, और जब आपका वक्त अच्छा न चल रहा हो तब पत्नी की परीक्षा करे।


व्यक्ति को सदैव अपने मित्रों का चुनाव सोच-समझ कर करना चाहिए। जीवन में “सच्ची मित्रता” तथा “मतलब की मित्रता” में भेद कर पाना असल में एक चुनौती है तथा व्यक्ति को व्यक्ति की परख कर मित्रों का चुनाव करना चाहिए। हमे किसी मूर्ख व्यक्ति को अपना मित्र नहीं बनाना चाहिए  जैसा कि आचार्य ने कहा है

मूर्खस्तु प्रहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः ।

भिद्यते वाक्य-शल्येन अदृशं कण्टकं यथा ॥ ०३-०७


अर्थ:- मूर्खो के साथ मित्रता नहीं रखनी चाहिए उन्हें त्याग देना ही उचित है, क्योंकि प्रत्यक्ष रूप से वे दो पैरों वाले पशु के सामान हैं,जो अपने धारदार वचनो से वैसे ही हदय को छलनी करता है जैसे अदृश्य काँटा शारीर में घुसकर छलनी करता है

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अंत में सबसे जरूरी बात हमे किसी पर भी आंख मूंद कर विश्वास नहीं करना चाहिए चाहे वह कितना भी करीबी क्यों न हो। क्यों समय और नियत बदलते देर नहीं लगती। आचार्य ने कहा है

न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत् ।

कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत् ॥ ०२-०

अर्थ:- एक बुरे मित्र पर तो कभी विश्वास ना करे। एक अच्छे मित्र पर भी विश्वास ना करें। क्यूंकि यदि ऐसे लोग आपसे रुष्ट होते है तो आप के सभी राज से पर्दा खोल देंगे।


अब आप कहेंगे कि एक बार आचार्य कह रहे है कि कहा विश्वास नहीं वहां मित्रता नहीं वही दूसरी तरफ यह भी कह रहे है कि मित्र पर विश्वास न करने की बात कह रहे है ये दोनों बातें विरोधाभाषी है। वास्तव में आचार्य कहना क्या चाहते है जिन गुप्त राज को बताने से हमे या हमारे परिवार को भारी नुकसान हो सकता है वह राज किसी के साथ भी शेयर नहीं करना चाहिए चाहे वह मित्र हो या शत्रु या हमारा सबसे बड़ा करीबी। इसीलिए अपने राज कभी किसी  के साथ शेयर न करे। वैसे अपने दृश्यम मूवी तो देखी ही होगी। वहां अजय देवगन अपने राज अपनी पत्नी और बच्चों को भी नहीं बताता। अगर आपको यह नहीं पता कि कौन सी बात किसी के साथ शेयर नहीं करनी चाहिए इसके लिए आप मेरी यह वाली वीडियो देख सकते है वीडियो का लिंक मैं डिस्क्रिप्शन  में डाल दूंगा।


साथियों व्यक्ति को अपने मित्रों का चुनाव सदैव सोच समझ कर करना चाहिए सच्चे मित्र का उपहास न कर या किसी भी कारण के वजह से उसे खोना नहीं चाहिए इसके विपरीत अपना काम निकालने वाले दोस्तों से दूर ही रहना चाहिए। यह बुरे समय पर आपकी मदद के लिए कभी सामने नहीं आयेगे और उल्टा आपकों समय-समय पर समस्या में डालते रहेंगे।


साथियों इसी के साथ आज की चर्चा यही समाप्त होती है। चर्चा में सामिल होने के लिए आप सभी साथियों का धन्यवाद। वीडियो को लेकर कोई सलाह या सुझाव हो तो कमेंट अवश्य करे। वीडियो अच्छी लगी हो तो वीडियो लाईक करे। वीडियो को शेयर करे ताकि यह वीडियो किसी जरूरत मंद के काम आ सके। आज की चर्चा में सामिल होने के लिए आप सभी का धन्यवाद, राधे राधे 



वरं न राज्यं न कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम् ।

वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो वरं न दार न कुदरदारः ॥ ०६-१३


varaṃ na rājyaṃ na kurājarājyaṃ varaṃ na mitraṃ na kumitramitram ।

varaṃ na śiṣyo na kuśiṣyaśiṣyo varaṃ na dāra na kudaradāraḥ ॥ 06-13


Meaning:- It is better to be without a kingdom than to rule over a petty one; better to be without a friend than to befriend a rascal; better to be without a disciple than to have a stupid one; and better to be without a wife than to have a bad one.


अर्थ:-एक बेकार राज्य का राजा होने से यह बेहतर है की व्यक्ति किसी राज्य का राजा ना हो. एक पापी का मित्र होने से बेहतर है की बिना मित्र का हो. एक मुर्ख का गुरु होने से बेहतर है की बिना शिष्य वाला हो. एक बुरीं पत्नी होने से बेहतर है की बिना पत्नी वाला हो.