शत्रु से बिना लड़े उसे पराजित करे, Chanakya Niti Motivational Video, lifelessonsbyguruji
जय श्री कृष्णा, साथियों, आशा है आप सभी कुशल मंगल से होंगे। चाणक्य नीति में आज की वीडियो में हम चर्चा करेंगे कि आचार्य चाणक्य ऐसी कौन सी नीतियां बताई है जिसमे आप दुश्मन को बिना मारे उसे पराजित कर सकते है। इसके लिए आचार्य चाणक्य ने 10 नीतियां बताई है। इसमें 7 ऐसी नीतियां है जिन्हे आपको करना है और 3 ऐसी नीतियां है जिन्हे आपको नही करना है। तो आइए आज की वीडियो पर चर्चा प्रारंभ करते है।
चाणक्य के अनुसार हमे किसी से बैर भाव या द्वेष नहीं रखना चाहिए क्योंकि बैर भाव या द्वेष किसी से भी हो हम अपना ही नुकसान करते है।
आप्तद्वेषाद्भवेनमृत्युः परद्वेषाध्नक्षयः।
राजग्वेषाद्भवेन्नशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः।।
अर्थात जो मनुष्य अपनी ही आत्मा से द्वेष रखता है वह स्व को नष्ट कर लेता है। दूसरो से द्वेष रखने से अपना धन नष्ट होता है। राजा से वैर-भाव रखने से मनुष्य अपना नाश करता है और ब्राह्मणों से द्वेष रखने से कुल का नाश हो जाता है।
इस श्लोक के अनुसार जो व्यक्ति अपनी आत्मा की बात नहीं सुनता वो व्यक्ति अपने को और अपनी कीर्ति दोनो को नष्ट कर लेता है। जो व्यक्ति अन्य दूसरे व्यक्ति से द्वेष रखता है वो अपना धन नष्ट करता है क्योंकि लड़ाई झगड़े और कोर्ट कचहरी में अपना समय और पैसा दोनो व्यय होता है।
इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने राजा या शासन से द्वेष रखता है वो अपना नाश करवा लेता है क्योंकि राजा उस व्यक्ति से बहुत शक्तिशाली होता है। आपने वह कहावत तो सुनी ही होगी कि जल में रहकर मगर से बैर नहीं लेना चाहिए।
लेकिन सबसे बुरी स्थिति तब होती है जब व्यक्ति ब्राह्मणों या विद्वानों से द्वेष रखता है वो अपने समस्त कुल का नाश करवा देता है। क्योंकि अगर विद्वान से द्वेष रखेगा तो विद्वान उस व्यक्ति और उसके परिवार को अच्छी शिक्षा नहीं देंगे अच्छी शिक्षा न मिलने के कारण उस व्यक्ति के कुल का ही नाश हों जाएगा। इसीलिए किसी से द्वेष या बैर नहीं रखना चाहिए।
लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियां हो जाती है कि आप किसी से बैर या द्वेष भी रखना नही चाहते फिर भी कुछ लोग आपके शत्रु बन जाता है। इनमे से कुछ शत्रु आपके बहुत करीबी होते है वो आपसे सामने सामने लड़ाई नहीं करते लेकिन मन ही मन आपके प्रति शत्रुता का भाव रखते है इसीलिए व्यक्ति को हमेशा शत्रु के प्रति सजग रहना चाहिए और अपने आपको सीधा और साधारण दिखने से बचना चाहिए
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम् ।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः ॥
अर्थ:-अपने व्यवहार में बहुत सीधे ना रहे. आप यदि वन जाकर देखते है तो पायेंगे की जो पेड़ सीधे उगे उन्हें काट लिया गया और जो पेड़ आड़े तिरछे है वो खड़े है l
नमस्कार साथियों, आप सभी को दशहरा उत्सव की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। जैसा की आप सब जानते है कि दशहरा उत्सव अपने शत्रुओं पर विजय पाने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है । इसी कारण इस पावन अवसर पर आज हम चर्चा करेंगे कि आचार्य चाणक्य ने शत्रु पर विजय पाने के लिए कॉन सी नीतियां बताई है। आचार्य चाणक्य को खुद भी शत्रु पर विजय पाने के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। चाणक्य एक गरीब ब्राह्मण और साधारण अध्यापक होते हुए भी भारत के सबसे शक्तिशाली शासक धनानंद को भरे दरबार में चुनौती देकर हराया था। उस धनानंद के बारे में यह जानकारी भी महत्वपूर्ण है कि धनानंद की शक्ति से घबकर विश्व विजय के अभियान पर निकले सिकंदर की सेना वापस लौट गई थी। यहीं कारण चाणक्य की नीतियां हमारे लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। आइए जानते है कि चाणक्य ने शत्रुओ पर विजय पाने के लिए कौन सी नीतियां बताई है।
इंट्रो
चाणक्य के अनुसार हमे किसी से बैर भाव या द्वेष नहीं रखना चाहिए क्योंकि द्वेष से हम अपना ही नुकसान करते है। चाणक्य ने हमे बताया है कि हमे किस से द्वेष नहीं रखना चाहिए।
चाणक्य नीति के अध्याय 10 श्लोक 11 के अनुसार, जो मनुष्य अपनी ही आत्मा से द्वेष रखता है वह स्व को नष्ट कर लेता है। दूसरो से द्वेष रखने से अपना धन नष्ट होता है। राजा से वैर-भाव रखने से मनुष्य अपना नाश करता है और ब्राह्मणों से द्वेष रखने से कुल का नाश हो जाता है।
चाणक्य नीति के अनुसार जो व्यक्ति अपनी आत्मा की बात नहीं सुनता वो व्यक्ति अपने को और अपनी कीर्ति दोनो को नष्ट कर लेता है।
जो व्यक्ति अन्य दूसरे व्यक्ति से द्वेष रखता है वो अपना धन नष्ट करता है क्योंकि लड़ाई झगड़े और कोर्ट कचहरी में अपना समय और पैसा दोनो व्यय होता है।
इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने राजा से द्वेष रखता है वो अपना नाश करवा लेता है क्योंकि राजा उस व्यक्ति से बहुत शक्तिशाली होता है। आपने वह कहावत तो सुनी ही होगी कि जल में रहकर मगर से बैर नहीं लेना चाहिए।
लेकिन सबसे बुरी स्थिति तब होती है जब व्यक्ति ब्राह्मणों या विद्वानों से द्वेष रखता है वो अपने समस्त कुल का नाश करवा देता है। क्योंकि अगर विद्वान से द्वेष रखेगा तो विद्वान उस व्यक्ति और उसके परिवार को अच्छी शिक्षा नहीं देंगे अच्छी शिक्षा न मिलने के कारण उस व्यक्ति के कुल का ही नाश हों जाएगा। इसीलिए किसी से द्वेष या बैर नहीं रखना चाहिए।
लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियां हो जाती है कि आप किसी से बैर या द्वेष भी रखना नही चाहते फिर भी कुछ लोग आपके शत्रु बन जाता है क्योंकि चाणक्य के अनुसार कुछ लोग हमेशा शत्रु ही रहते है। जैसा कि इस श्लोक में स्पष्ट हो जाता है।
चाणक्य नीति के अध्याय 10 श्लोक 6 के अनुसार, मांगने वाला लोभी मनुष्य का शत्रु होता है। मूर्खो का शत्रु उपदेश देने वाला
होता है। व्यभारिणी स्त्री का शत्रु उनका पति होता है और चोर का शत्रु चांद होता है।
चाणक्य के अनुसार कुछ लोग कर्मो के कारण ही दूसरो के शत्रु बन जाते है जैसे
लालची व्यक्ति किसी को कुछ देना नही चाहता इसिलियें जो व्यक्ति लालची व्यक्ति से कुछ मांगने आता है वह व्यक्ति लालची व्यक्ति का शत्रु बन जाता है।
मूर्ख व्यक्ति किसी की बात नहीं सुनते इसीलिए जो व्यक्ति मूर्ख व्यक्ति को उपदेश देता है वो व्यक्ति मूर्ख व्यक्ति का शत्रु बन जाता है। इसीलिए विद्वान व्यक्ति को चाहिए कि वो मूर्ख व्यक्ति को सलाह या उपदेश न दे।
इसी प्रकार जो स्त्री दूसरे पुरुष से अनैतिक संबंध बनाती है ऐसी स्त्री का शत्रु खुद उनका पति होता है। इसी तरह जो पुरुष दूसरी महिला से अनैतिक संबंध बनाता है ऐसे पुरुष की शत्रु खुद उसकी पत्नी होती है। अतः ऐसी स्त्री के पति और पुरुष की पत्नी को सदैव सावधान रहना चाहिए।
चोर अंधेरी काली रात में चोरी करना पसंद करते है ऐसे में चांद न चाहते हुए भी चोरों का शत्रु बन जाता है।
चाणक्य ने शत्रु को पहचाने के बाद शत्रु पर विजय पाने की बहुत कारगर नीति बनाई है यह नीति जितनी कारगर 2500 वर्ष पूर्व थी आज भी उतनी ही करकर है।
चाणक्य नीति के अध्याय 7 श्लोक 10 के अनुसार, बलवान शत्रु को अनुकूल व्यवहार तथा दुर्जन शत्रु को प्रतिकूल व्यवहार के द्वारा अपने वश में करे। इसी प्रकार अपने समान बल वाले शत्रु को विनम्रता या बल द्वारा, जो भी उस समय उपयुक्त हो, अपने वश करने का प्रयत्न करना चाहिए।
चाणक्य ने तीन तरह के शत्रु की बात की है और यह बताया है कि इन पर कैसे विजय पाया जाए।
जो शत्रु आपसे बलवान हो उसके साथ अनुकूल व्यवहार करना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों से ऐसा व्यवहार करे जो इस तरह के शत्रु को प्रसन्न कर सके जिससे इनके साथ जल्द से जल्द द्वेष खतम हो और वह बलवान व्यक्ति आपका मित्र बन जाए।
जो शत्रु दुष्ट प्रवृति का हो उसके साथ प्रतिकूल व्यवहार करना चाहिए। इन्हे बलपूर्वक या जैसे भी संभव हो कुचल कर नष्ट कर देना चाहिए। जिससे अन्य व्यक्तियों को सबक मिले और कोई भीं आपका शत्रु बनने की हिम्मत न कर सके।
अंत में जो शत्रु आपके समान बलवान हो उसके साथ शत्रु के चरित्र और समय के अनुसार विनम्रता से या बलपूर्वक जिस व्यवहार से वह शत्रु आपके वश में आता है उसे वश में करना चाहिए।
इस श्लोक में एक छुपी हुई बात है कि हम शत्रु के साथ सुसंगत व्यवहार तब ही कर पाएंगे जब हम शत्रु के बारे में पूरी तरह जानेंगे। इसीलिए शत्रु के साथ सुसंगत व्यवहार करने से पहले उसके बारे में ठीक से जानकारी कर ले कि शत्रु का चरित्र कैसा है वह कितना बलवान है। और वह आपका नुकसान किस तरह से और कितना कर सकता है। आधे अधूरी जानकारी से उठाया गया कोई भी कदम खतरनाक हो सकता है।
साथियों आज की वीडियो यही समाप्त हुई भगवान राम से यही प्रार्थना है कि भगवान सभी के शत्रुओं को समाप्त कर, सभी का जीवन सुखमय बनाए।
धन्यवाद
नमस्कार साथियों, आपका स्वागत है आपके अपने चैनल life lessons by guruji में , इस चैनल पर हम जीवन यात्रा को सुगम और सफल बनाने वाले विषयों पर चर्चा करते है। आज चर्चा प्रारंभ करे उससे पहले आप सभी को दशहरा उत्सव की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। दशहरा उत्सव अपने शत्रुओं पर विजय पाने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है । यह शत्रु हमारे शरीर के अंदर भी हो सकता है जैसे नशा और बुरी आदतें। बाहर भी हो सकता है जैसे जो लोग आपकी सफलता से खुश नहीं है और आपसे बैर रखते है।
इसी कारण इस पावन अवसर के उपलक्ष्य पर आज हम चर्चा करेंगे कि आचार्य चाणक्य ने शत्रु पर विजय पाने के लिए कॉन सी नीतियां बताई है। आचार्य चाणक्य को खुद भी शत्रु पर विजय पाने के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। आइए चर्चा करते है कि चाणक्य ने शत्रुओ पर विजय पाने के लिए कौन सी नीतियां बताई है।
साथियों जिन शत्रुओं को हम पहचानते है उनसे लड़ना और उन पर विजय पाना आसान होता है जबकि जो शत्रु आस्तीन के सांप होते है उन्हे पहचानना बहुत कठिन होता है जब पहचानना कठिन होता है तो उनसे जीतना और भी कठिन होता है। चाणक्य ने ऐसे शत्रुओं को पहचानने के लिए यह उपाय बताया है।
चाणक्य नीति के अध्याय 14 के श्लोक 10 के अनुसार जिसका बुरा करने की इच्छा हो, उससे सदा मीठी बात करनी चाहिए, जैसे शिकारी हिरण को पकड़ने से पहले मीठी आवाज में गीत गाता है।
अर्थात हमे अपने शत्रु को मीठी बात करके उसे अपनी तरफ आकर्षित करना चाहिए। मीठी बात का आशय यह है कि ऐसी बात करना जो शत्रु को अच्छी लगे उसकी चापलूसी करे जिससे वह बहक जाए।, यह श्लोक आपके और शत्रु दोनो के लिए समान हितकारी है क्योंकि शत्रु के लिए इसलिए हित कारी ताकि वह अपने शत्रु का बुरा कर सके और आपके लिए इसलिए हित कारी है क्योंकि आप इस नीति के माध्यम से अपने आस्तीन के सांप को पहचान पाएंगे अर्थात हम यह भी कह सकते है जो हमसे मीठी और लुभावनी बात करे हमे उससे सावधान रहना चाहिए। हो सकता है वह हमे अपने जाल में फसाना चाहता हो।
इस तरह के शत्रु से लड़ना आसान नहीं होता है सबसे पहले इन्हें पहचानना आसान नहीं होता और अगर समय रहते पहचान गए तो इनसे कैसे लड़ा जाए यह बहुत कठिन होता है। आचार्य ने इस तरह के शत्रु से लड़ने के लिया यह नीति बताई है
चाणक्य नीति के अध्याय 3 के श्लोक 3 के अनुसार, समझदार व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपनी कन्या का विवाह किसी अच्छे कुल में करे, पुत्र को अच्छी शिक्षा दे। उसे इस प्रकार की शिक्षा दे, जिससे उसका मान सम्मान बढे।
शत्रु को किसी ऐसे व्यसन में डाल दे , जिससे उसका बाहर निकलना कठिन हो जाए। और अपने मित्र को धर्म के काम में लगाए।
अन्य बातों पर उनके उनके चर्चित विषय के दिन चर्चा करेंगे आज हम इस श्लोक के शत्रु वाली नीति पर चर्चा करते है। इस श्लोक में आचार्य ने कहा है कि शत्रु को किसी ऐसे व्यसन में डाल दे जिससे उसका बाहर निकलना कठिन हो जाए। देख लीजिए आज से लगभग 3000 साल पहले भी आचार्य नशा के बुरे प्रभावों को जानते थे। इसीलिए मैं हमेशा इस पुस्तक को अपना मार्ग दर्शक मानता हु। अर्थात अपने शत्रु को मीठी और लुभावनी बातों से ऐसे नशे के जाल में फंसा दे जिससे वह उबर ही न पाए अपने नशे में हमेशा खोया रहे कभी भी आपके बारे में सोच पाने का मौका ही na mile। आज कल कई तरह के नशे बाजार में है जिनके जाल में।कोई फंस जाए तो जीवन भर उस नशे से नही निकल पाएगा।
लेकिन कभी कभी शत्रु से लड़ने में नहीं बल्कि उससे दूर जाने में ही ज्यादा समझदारी है जिससे आपकी जान बच सकती है जैसे
चाणक्य नीति के अध्याय 3 के श्लोक 19 के अनुसार प्राकृतिक आपदा जैसे वर्षा होना और सूखा पड़ना अथवा दंगे-फसाद आदि होनेपर, महामारी के रूप में रोग फैलने, शत्रु के आक्रमण करने पर, भयंकर अकाल पड़ने पर और नीच लोग का साथ होने पर जो व्यक्ति सब कुछ छोड़-छाड़कर भाग जाता है, वह मौत के मुंह में जाने से बच जाता है।
अर्थात अगर कोई शत्रु ऐसा है जो प्राकृतिक आपदा जैसा है जिससे आप जीत नही सकते वैसे शत्रु से लड़ने में कोई समझदारी नहीं है बल्कि उस शत्रु से दूर जाने में समझदारी है जिससे आपकी जान बच सके। क्योंकि वह शत्रु इतना ताकतवर है जिससे आप जीत नही सकते। एक अन्य श्लोक में आचार्य कहते है।
चाणक्य नीति के अध्याय 7 श्लोक 10 के अनुसार, बलवान शत्रु को अनुकूल व्यवहार तथा दुर्जन शत्रु को प्रतिकूल व्यवहार के द्वारा अपने वश में करे। इसी प्रकार अपने समान बल वाले शत्रु को विनम्रता या बल द्वारा, जो भी उस समय उपयुक्त हो, अपने वश करने का प्रयत्न करना चाहिए।
चाणक्य ने तीन तरह के शत्रु की बात की है और यह बताया है कि इन पर कैसे विजय पाया जाए।
जो शत्रु आपसे बलवान हो उसके साथ अनुकूल व्यवहार करना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों से ऐसा व्यवहार करे जो इस तरह के शत्रु को प्रसन्न कर सके जिससे इनके साथ जल्द से जल्द द्वेष खतम हो और वह बलवान व्यक्ति आपका मित्र बन जाए।
जो शत्रु दुष्ट प्रवृति का हो उसके साथ प्रतिकूल व्यवहार करना चाहिए। इन्हे बलपूर्वक या जैसे भी संभव हो कुचल कर नष्ट कर देना चाहिए। जिससे अन्य व्यक्तियों को सबक मिले और कोई भीं आपका शत्रु बनने की हिम्मत न कर सके।
अंत में जो शत्रु आपके समान बलवान हो उसके साथ शत्रु के चरित्र और समय के अनुसार विनम्रता से या बलपूर्वक जिस व्यवहार से वह शत्रु आपके वश में आता है उसे वश में करना चाहिए।
इन दोनों श्लोक में एक छुपी हुई बात है कि हम शत्रु के साथ सुसंगत व्यवहार तब ही कर पाएंगे जब हम शत्रु के बारे में पूरी तरह जानेंगे। इसीलिए शत्रु के साथ सुसंगत व्यवहार करने से पहले उसके बारे में अच्छी तरह से जानकारी।प्राप्त कर ले कि शत्रु का चरित्र कैसा है वह कितना बलवान है। और वह आपका नुकसान किस तरह से और कितना कर सकता है। आधे अधूरी जानकारी से उठाया गया कोई भी कदम खतरनाक हो सकता है।
इसी के साथ आज चर्चा यही समाप्त होती है वीडियो या चैनल के लिए कोई सलाह , सुझाव या शिकायत भी हो तो कमेंट करे उसे आपका एक एक कमेन्ट हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर वीडियो अच्छी लगी हो तो Like कर हमे प्रोत्साहित करे। वीडियो को शेयर करे ताकि अन्य लोग भी इस वीडियो का लाभ उठा सके। धन्यवाद
नमस्कार दोस्तों मैं हूं आपका दोस्त मनोज, आपका स्वागत करता हु आपके चैनल life lessons by Guruji पर, आपके इस चैनल में आपको अपनी जीवन यात्रा के बीच में पड़ने वाली कठिनाइयों से बचने के उपाय बताए जाते है। जीवन में सफल होना है तो subscribe करके इस चैनल से जुड़े रहे। सबसे महत्वपूर्ण बात वीडियो को कभी बीच में छोड़ कर न जाए क्योंकि आधा अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है।
दोस्तो मैंने YouTube पर चाणक्य नीति से संबंधित कई वीडियो देखे है लेकिन ज्यादातर पर जो जानकारी दी है जो चाणक्य नीति में कही भी नही लिखी है। और उनके थंबमेल uff total click bate, जो चाणक्य जैसे महान व्यक्ति को अपमानित करने जैसा है। लेकिन मेरे चैनल पर आपको अध्याय संख्या और श्लोक संख्या के साथ सीधी और सच्ची जानकारी मिलेगी। आज इंट्रो कुछ ज्यादा ही बड़ा हो गया है। तो अब देर न करके वीडियो शुरू करते है।
आज हम बात करेंगे कि चाणक्य नीति के अनुसार दुर्जन व्यक्तियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। जैसा की हम सब जानते है कि दुर्जन व्यक्ति मानव समाज के दुश्मन होते है वो बुरे काम करते है और उन्हे इस अपराध का बिलकुल भी पछतावा नही होता है।
अज्ञानता वश कई लोग शत्रु और दुर्जन व्यक्ति को एक ही मान लेते है। जबकि दोनो अलग अलग है। आपका शत्रु दुर्जन व्यक्ति हो भीं सकता है और नही भी। हों सकता है कि कोई व्यक्ति बहुत अच्छे चरित्र का हों लेकिन परिस्थिति वश आपका शत्रु बन गया हो, जैसे महाभारत में गुरु द्रोण और भीष्म पितामह। शत्रु से हमे किस तरह का व्यवहार करना है इसके बारे में आगे आने वाली वीडियो में बात करेंगे।
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चाणक्य नीति के अध्याय 17 श्लोक 8 के अनुसार सांप का विष उसके दांत में होता है, मक्खी का विष उसके सिर में होता है बिच्छू का विष उसके पुंछ में होता है लेकिन दुर्जन व्यक्ति के सभी अंग विष से भरे होते है।
अर्थात विषैले जानवरों का अंग विशेष में विष होता है और समय विशेष पर विष का प्रयोग करते है जबकि दुर्जन व्यक्तियों के हर अंग में विष होता है और वो हर समय समाज में जहर छोड़ते रहते है। ये समाज के लिए घातक होते है।
चाणक्य नीति के अध्याय 15 श्लोक 3 के अनुसार दुर्जन व्यक्ति और कांटे से बचने के दो उपाय है कि या तो उनसे दूर रहा जाए या फिर उनको कुचल कर उनका अस्तित्व समाप्त कर दिया जाए।
इस सिलसिले में एक आचार्य चाणक्य से जुड़ा एक प्रसंग है, यह बात उस समय की है जब सिकंदर महान अपने विश्वविजय के अभियान पर छोटे छोटे राज्यों जीत कर तेज़ी से भारत की तरफ बढ़ रहा था। उसका निशाना भारत था। इस बात की सूचना आचार्य को अपने गुप्त सूत्रों से प्राप्त हुई। आचार्य तुरंत सम्पूर्ण भारत को एक करने के अभियान पर मगध की राजधानी पाटली पुत्र की तरफ निकल पड़े। मगध उस समय भारत का सबसे बड़ा और शक्तिशाली राज्य था। पाटलिपुत्र जल्दी पहुंचने के लिए उन्होंने मुख्य मार्ग न चुन कर एक शॉर्ट कट रास्ता चुना। मार्ग में एक जगह उनके पैरों में किसी पौधे का कांटा चुभ गया। आचार्य अत्यंत क्रोधित हुए और शिष्यों को आदेश दिया कि जड़ से उखाड़ फेंको इस पौधे को। शिष्यों ने आचार्य के आदेश का पालन करते हुए उस पौधे को जड़ से उखाड़ फेंका। इस प्रसंग से आचार्य की दुर्जन व्यक्तियों के प्रति मानसिकता का पता चलता है।
अर्थात दुर्जन व्यक्तियों से बचने के सिर्फ दो ही उपाय है या तो उनसे पर्याप्त दूरी बनाया जाए। ताकि दुर्जन व्यक्तियों से कभी सामना न हो।
लेकिन परिस्थिति वश दुर्जन व्यक्ति से सामना हो जाए तो उन्हें अपने कृत्य की इतनी कड़ी सजा दी जाएं ताकि दुर्जन व्यक्ति की भविष्य में अपराध करने हिम्मत न हो। और समाज के अन्य लोगो को भी सबक मिले। ताकि कोई व्यक्ति दुबारा उस अपराध को करने का प्रयास न करे।