आज जब गुरु जी अपने कमरे में थे तभी उनके मोबाइल पर दरोगा जी का कॉल आया
कि गुरुजी एक दिन मैं ऐसे ही आपकी चर्चा अपने स्टाफ में कर रहा था तो चर्चा चलते चलते हमारे sp साहब तक पहुंच गई। उन्हें भी कोई प्रॉब्लम है जिसके सॉल्यूशन के लिए वह आपसे मिलना चाहते है। क्या आपके पास उनसे मिलने का समय है। गुरु जी बोले अरे दरोगा जी ।कैसी बातें कह रहे है मैं कौन सा vip हु जो मेरे पास समय नहीं होगा वैसे भी आज तो संडे है मैं अपने कमरे में ही हु। अगर sp साहब के पास समय हो तो मेरे कमरे में ही आ जाए। दरोगा जी बोले ठीक है थोड़ी देर में sp साहब आपसे मिलने आपके कमरे में आयेंगे।
थोड़ी देर में SP साहब गुरु जी से मिलने पहुंच गए। गुरु जी ने ओपचारिक अभिवादन के बाद उन्हें चाय सर्व की और उनके आने का कारण पूछा। फिर sp साहब ने बताया
गुरु जी मेरा परिवार बहुत छोटा है उसने मैं, मेरी मां और मेरी बड़ी बहन है। बचपन में ही हमारे पिताजी की एक रोड एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई थी उसके बाद मेरी मा हम दोनों भाई बहन को लेकर हमारे मामा के पास लेकर आ गई मामा की देख रेख में हमारी पढ़ाई पूरी हुई और पढ़ाई पूरी करने के बाद मेरी बहन जज बन गई और उसकी शादी भी एक जज से हो गई है। बहन की शादी के कुछ दिनों बाद मेरी भी नौकरी पुलिस विभाग में लग गई।
गुरु जी बोले भगवान की कृपा से आपके परिवार में सब कुछ ठीक है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि प्रॉबलम कहा है।
Sp साहब बोले गुरु जी ये तो मेरा सामान्य परिचय था जिसे सारी दुनिया जानती है लेकिन मेरी समस्या इसी में छुपी हुई है वास्तव में हम लोग पुराने जमींदार थे हमारे पास हजारों बीघा जमीन हुआ करती थी इसी संपत्ति के लालच में मेरे पिताजी के चचेरे भाइयों ने पिताजी की हत्या करवा दी। मेरी मां ने कभी हमे बताया नहीं लेकिन मुझे लगता है कि उस हवेली में मेरी मां के साथ कुछ तो बहुत बुरा हुआ था इसी डर के कारण मां हमे वह से लेकर मामा के घर आ गई थी और बहन को लेकर हमेशा डरी रहती थी। धीरे धीरे मेरे पिताजी के चचेरे भाइयों ने हमारी पूरी जमीन और हवेली हड़प ली। आज मैं अपनी हवेली और जमीन के लिए आगे आना चाहता हु तो मेरी मां और बहन मुझे रोकती है कहती है कि वह लोग बहुत खतरनाक है गांव में उन्होंने बहुत से लोगों की हत्याएं करवाई है सब लोग उनसे डरते है उनके खिलाफ कोई बोलता नहीं है। उनसे लड़ना सही नहीं है। वैसे भी अब हमारे पास किसी चीज की कमी नहीं है और वो लोग भी कही न कही हमारे अपने ही तो है। इसीलिए उनसे लड़ाई न करो । अब आप बताइए गुरु जी मुझे क्या करना चाहिए। अपनी मां की बात मान कर शांत हो जाऊ या अपने हक के लिए लड़ूं ।
गुरु जी बोले अर्थात आप उसी भंवर में फंसे है जिस भंवर में महाभारत के युद्ध में अर्जुन फंसे थे । इसीलिए आपको भी वही मार्ग बताऊंगा जो महाभारत के समय भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया था। भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कहा है
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।।2.37।।
।।2.37।।
अर्थात अगर युद्ध में तू मारा जायगा तो तुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी और अगर युद्ध में तू जीत जायगा तो पृथ्वी का राज्य भोगेगा। अतः हे कुन्तीनन्दन! तू युद्ध के लिये निश्चय करके खड़ा हो जा।
जब भगवान ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था तब अर्जुन भी आपकी तरह संदेह की स्थिति में थे कि उन्हें क्या करना चाहिए एक तरफ उनके और उनके परिवार के सम्मान का प्रश्न था और दूसरी तरफ युद्ध भी अपने भाइयों से था । तब भगवान कृष्ण ने उन्हें बताया था कि इस युद्ध में एक पक्ष को चुनना ही पड़ेगा। क्योंकि एक समय के बाद अन्याय के खिलाफ चुप रहना समझदारी नहीं कायरता कहलाता है। डर कर अन्याय के खिलाफ चुप रहने से कई गुना अच्छा है न्याय के पक्ष में लड़ते हुए हार जाना।
Sp साहब आप मेरे पास आए है तो इसका सीधा सीधा अभिप्राय है कि कही न कही आपके मन में परिवार के सम्मान के लिए आगे आने की बात है। इसीलिए अपने मन की बात मानिए और अपने परिवार के सम्मान के लिए संघर्ष कीजिए। मैं आपको संघर्ष करने के लिए कह रहा हु इसका कतई मतलब यह नहीं है कि आप हिंसा करे। यह महाभारत का समय नहीं है जब अपने हक के लिए अर्जुन को हथियार उठाने पड़े थे आज के समय में बिना हथियार उठाए ही आप कानूनी रूप से संघर्ष करके दुश्मन को हरा सकते है।
सौभाग्य से आप और आपकी बड़ी बहन कानून की बड़ी जानकार है आप कानूनी रूप से देखिए कि आप अपने परिवार के लिए कैसे संघर्ष कर सकते है क्योंकि अब आपके पास हारने के लिए कुछ भी नहीं बचा आपकी जमीन और हवेली आपके पिता के चचेरे भाइयों के पास है इसीलिए अब संघर्ष करने से आपका कोई भी नुकसान नहीं है। इस संघर्ष से आपका आत्म सम्मान बचा रहेगा। और अपने परिवार के प्रति आपकी जिम्मेदारी का पालन भी हो जाएगा। और कही आप संघर्ष में हार भी गए तब भी आपका कुछ नहीं जाएगा और आपके मन में संतुष्टि भी रहेगी कि आपने अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया था।
इसके बाद sp साहब अभिवादन करके चले गए इस बात चीत के करीब 6 महीने बाद sp साहब ने गुरु जी को फोन किया और बताया कि आपके कहने के बाद मैने जमीन के मालिकाना हक के बारे में पता किया तो पता चला कि सभी जमीनें अभी भी पिताजी के नाम से है उनके चचेरे भाइयों ने फर्जी वाडा करके जमीन पर कब्जा करके रखा था मैने प्रशासन पर थोड़ा दबाव बनाया तो सारी जमीन और हमारी हवेली हमे वापस मिल गई। फिर मैने पिताजी के एक्सीडेंट वाले कैस को दुबारा ओपन करवाया थोड़ी जांच हुई तो मेरा शक सही निकला कि पिताजी का कत्ल उनके ही चचेरे भाइयों ने करवाया था। इससे सभी को जेल हो गई। यह सब देख कर गांव वालों के मन से उन लोगों का डर निकल गया लोग खुल कर सामने आए जिससे गांव में उनके द्वारा किए गए कई सारे अपराधों की फैले दुबारा खुल गई। जिन केसों के गवाह नहीं मिल रहे थे अब उनके गवाह भी मिलने लगे थे। दीदी कह रही है कि उनके खिलाफ इतने केस हो गए है कि अब वे सब जीवन भर जेल में बिताएंगे। इन सब के लिए गुरु जी आपका धन्यवाद। अगले महीने पिताजी का श्रंद्धाजलि कार्यक्रम है मेरी मां की बहुत इच्छा है कि आप भी उस कार्यक्रम में जरूर शामिल हो। Please मेरी मां की इच्छा जरूर पूरी कीजियेगा। आखिर आपकी वजह से ही पिताजी को असली श्रद्धांजलि मिल पा रही है। मैं आपके लिए गाड़ी भेज दूंगा।
फिर गुरु जी ने कहा कि गाड़ी भेजने की कोई जरूरत नहीं है आपकी मां की इच्छा है तो मैं कार्यक्रम में जरूर शामिल होऊंगा। आप सिर्फ अपना एड्रेस वॉट्सएप कर दीजिएगा।
साथियों इसी के साथ आज की कहानी यही समाप्त होती है अगर कहानी अच्छी लगी हो तो वीडियो को शेयर कर भगवद गीता के प्रचार प्रसार में हमारा सहयोग कर पुण्य का भागीदार बनिए। राधे राधे
जय श्रीकृष्णा साथियों, आशा है आप सभी कुशल मंगल होंगे। इस चैनल पर हम प्राचीन पुस्तकों से मिलने वाले अमूल्य संदेश को काल्पनिक कहानियों के माध्यम से सभी साथियों के साथ शेयर करते है। जिससे आप खुद को कहानी में बताई गई परिस्थिति से जोड़ पाए और वीडियो के संदेश को अपने जीवन में अपना कर अपनी जीवन यात्रा सुगम और सुखमय बना सके। इसी सीरीज में आज समझेंगे कि अपने कैरियर में हम जो बनना चाहते थे वह न बन सके तो हमे क्या करना चाहिए तो आइए आज की वीडियो प्रारंभ करते है
गुरु जी रोज शाम को साथियों के साथ चाय पीने एक दुकान पर जाते है। इधर कुछ दिनों से जब गुरु जी का चाय पीने का समय होता था दुकान पर बहुत भीड़ लग जाती थी। एक दिन दुकान वाले भैया ने गुरु जी से बहुत ही खुफिया स्टाइल में एक व्यक्ति की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वह व्यक्ति पुलिस में है आप लोगों के आने से पहले दुकान पर आ जाता है और आप लोगों के जाने के बाद जाता है। करीब 5 से 6 चाय और 5 से 6 सिगरेट पी जाता है। चुप चुप के आप लोगों की बातें सुनता है। थोड़ा सावधान रहिएगा कि कही आप लोगों को कोई दिक्कत न कर दे। इस पर गुरु जी ने कहा कि वह आदमी आपको चाय और सिगरेट के पूरे पैसे देते है न। फिर कोई बात नहीं। हमारे पास कौन सा अलीबाबा का खजाना है या हमने कोई अपराध किया है जो हम पुलिस से डरे।
लेकिन कुछ दिनों बाद उस व्यक्ति ने गुरु जी से कहा अगर आपके पास थोड़ा समय है आज मेरे साथ बैठिए मुझे आपसे बहुत जरूरी बात करनी है। गुरु जी उनके सामने वाले चेयर पर बैठ गए। फिर उस व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं आपके क्षेत्र में दरोगा के पद पर ट्रांसफर हो कर आया हु एक दिन मैने आप लोगों की बात सुनी तो न जाने क्यों मुझे आपकी बात बहुत अच्छी लगी दिल को बहुत सुकून मिला था उस दिन से मैं रोज शाम को आप सभी का वेट करता हूं और आप लोगों की बातें सुनता हूं दिल को बहुत सुकून मिलता है।
गुरु जी ने कहा अगर ऐसी बात है तो आप हमें कौन कर सकते है। मेरे साथी आपसे मिल कर बहुत खुश होंगे। लेकिन एक समस्या है कि स्मोकिंग इस नोट अलाउड इन माई ग्रुप। गुरु जी ने हंसते हुए कहा।
इस पर दरोगा जी बोले क्या बताऊं गुरु जी जिंदगी में इतनी उलझन है इसीलिए सिगरेट की लत लग गई है। गुरुजी मैं IPS ऑफिसर बनना चाहता था इसके लिए कोचिंग भी की लेकिन मेरा exam क्लियर नहीं हो पाया कभी mains में और कभी इंटरव्यू में फेल होता रहा रही सही कसर reservation ने पूरी कर दी। देखिए गुरु जी Ips officer बनना चाहता था और कहा दरोगा बन कर डर बदर धक्के खा रहा हूं। कभी कभी मन में विचार आता है कि जो काम कभी चाहा नहीं वह करना पड़ रहा है। इसी लिए मन हमेशा दुखी रहता है बहुत लंबे समय तक मैं डिप्रेशन में भी रहा।
गुरुजी ने पूछा आप ips ऑफिसर क्यों बनना चाहते थे। इस पर दरोगा जी तपाक से बोले ताकि जीवन में खुशियां मिल सके परिवार सुख से रहे।
गुरु जी ने पूछा तो आपके जीवन में खुशियां नहीं है। दरोगा जी क्या आपकी शादी दारोगा की नौकरी मिलने के बाद हुई थी। इस पर दरोगा जी ने सहमति से सिर हिलाया। अर्थात आपकी पत्नी ने कभी आपके ऊपर ips ऑफिसर बनने का प्रेशर नहीं डाला होगा गुरु जी ने पूछा। इस पर भी दरोगा जो ने सहमति से सिर हिलाया। गुरु जी ने पूछा आपके बच्चे कैसे है दरोगा जी ने उत्तर दिया कि मेरे 2 बच्चे है और दोनों अभी जॉब की तैयारी कर रहे है। दोनों बच्चे बहुत अच्छे है।
गुरु जी बोले इसका मतलब परिवार की तरफ से करियर को लेकर कोई प्रॉब्लम नहीं है। सारी प्रॉब्लम आपने खुद से पैदा की है। दरोगा जी कई बार हम खुद ही अपने लिए समस्या बन जाते है और जीवन भर उसी में उलझे रहते है। डिप्रेशन का शिकार बन जाते है और इसका दोष दूसरों के सिर मढ़ते है। दरोगा जी प्रॉब्लम आपने खुद पैदा की है इसीलिए आप खुद ही इस प्रॉब्लम से बाहर निकल सकते है। कोई और आपके लिए कुछ भी नहीं कर सकता। आपके लिए भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कहा है
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।12.10।।
अर्थात अगर तू अभ्यास में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिये कर्मों को करता हुआ भी तू सिद्धि को प्राप्त हो जायगा।
इसी बात को आचार्य चाणक्य ने अपनी पुस्तक चाणक्य नीति में इस तरह लिखा है
ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम् । दैवायत्तं यतः सर्वं तस्मात्सन्तोषमाश्रयेत् ॥
अर्थात इच्छित सभी सुख दैवाधीन हैं, इसलिए सन्तोष में रहना चाहिए।
इन दोनों श्लोक के अनुसार यह जरूरी नहीं है कि आप जो बनना चाहते थे वो आप बन ही जाए। उसके लिए कई परिस्थितियों को आपके अनुकूल होना पड़ता है। ऐसा बहुत ही कम लोगों के साथ होता है कि जो वह बनना चाहते है वह बन जाए। इसीलिए भगवान ने जो आपको बनाया है उसी के अनुरूप कर्म करके भी आप जीवन में सफल हो सकते है।
जीवन में सफल होने का कोई एक ही रास्ता नहीं है। अगर हम अपने सोचे हुए रास्ते पर न चल सके तो इसका मतलब यह नहीं है कि सफलता के सारे रास्ते बंद हो गए है और अब कुछ भी नहीं हो सकता। इंसान की असली परीक्षा भी इसी में है जो रास्ता उसे भगवान ने दिया है उसी के अनुरूप चलकर अपने जीवन का निर्वाह कर अपने जीवन को सफल बनाए।
दरोगा जी इसे ऐसे समझ सकते है आप ips ऑफिसर बनना चाहते थे दुर्भाग्य से आप ips ऑफिसर नहीं बन सके। लेकिन सौभाग्य से आप दरोगा बन गए है तो उसी के अनुरूप कर्म करके भी आप सुखी जीवन पा सकते है।
वैसे देखा जाए तो आपके जीवन में कौन सी खुशियां नहीं है अच्छी पत्नी है अच्छे बच्चे है अच्छी नौकरी है। अर्थात सब कुछ अच्छा अच्छा है लेकिन आपका मन अच्छा नहीं है। आपका मन अभी भी 20 साल पहले फंसा हुआ है जब आप ips ऑफिसर की तैयारी कर रहे थे। आपको क्या लगता है ips अधिकारियों के जीवन में दुख नहीं होता। दुख और सुख तो सबके जीवन में आते है चाहे वह ips ऑफिसर हो या कोई आम आदमी।
इसीलिए दरोगा जी वर्तमान में आइए। अपनी इच्छाओं को कंट्रोल कीजिए अपने मन की नेगेटिविटी को बाहर निकल दीजिए क्योंकि आपने पूरे मन से ips ऑफिसर की परीक्षा दी थी आप कर्म करने के बावजूद सफल नहीं हो सके तो इसमें आप का कोई दोष नहीं है। इसके लिए अपना कीमती जीवन बरवाद करने का कोई मतलब नहीं है। इसीलिए जो मिला है उसी में संतोष कीजिए और अपने पद के अनुरूप अपने कर्तव्यों का अच्छे मन से निर्वाहन कीजिए। भगवान चाहेंगे तो इसी पद से भी आपको वह सारी खुशियां मिल जाएगी जो आप दुनिया के सबसे बड़े पद को पाने के बाद भी न मिल पाती।
इसके बाद गुरुजी के साथी अध्यापक राहुल जी बोले कि आज इन्हें भी अपनी बकवास में लपेट लिया। इसी के साथ राहुल जी और गुरु जी हंसने लगे और दरोगा जी भी मुस्कुरा दिए। दरोगा जी बोले बकवास नहीं बहुत कीमती बात कही है गुरु जी ने। मैं इनकी बातों पर जरूर अमल करूंगा।
साथियों इसी के साथ आज की कहानी यही समाप्त होती है अगर कहानी अच्छी लगी हो तो वीडियो को शेयर कर भगवद गीता के प्रचार प्रसार में हमारा सहयोग कर पुण्य का भागीदार बनिए। राधे राधे
जय श्रीकृष्णा साथियों, आशा है आप सभी कुशल मंगल होंगे। इस चैनल पर हम प्राचीन पुस्तकों से मिलने वाले अमूल्य संदेश को काल्पनिक कहानियों के माध्यम से सभी साथियों के साथ शेयर करते है। जिससे आप खुद को कहानी में बताई गई परिस्थिति से जोड़ पाए और वीडियो के संदेश को अपने जीवन में अपना कर अपनी जीवन यात्रा सुगम और सुखमय बना सके। इसी सीरीज में आज कहानी में समझेंगे कि वास्तविक पूजा क्या है और भगवान कौन सी पूजा से प्रसन्न होते है। तो आइए आज की वीडियो प्रारंभ करते है
गुरु जी के घर के पास राम कुमार जी रहते है राम कुमार जी के परिवार में उनकी पत्नी और उनका बेटा राजीव है। राजीव ने अभी कुछ समय पहले अपनी पढ़ाई पूरी करके और शहर की ही एक अच्छी कंपनी में काम कर रहा है। नौकरी मिलने के बाद राजीव की शादी सरिता से हुई । सरिता बहुत ही सीधी सुंदर और सुशील लड़की है। इसे किस्मत का खेल कहे या सरिता के कदमों का फल, शादी के कुछ दिनों बाद ही राजीव की सरकारी नौकरी लग गई। जिस कारण राजीव को दूसरे शहर नौकरी ज्वाइन करने जाना पड़ा। राजीव अब महीने में कभी कभी ही घर आ पाता था।
राजीव की सरकारी नौकरी लग जाने से सब खुश थे घर में सत्य नारायण भगवान की कथा भी हुई थी। लेकिन न जाने क्यों राजीव की मां अब बहुत चिड़चिड़ी हो गई बात बात पर वह सरिता की डांटने लगी, हमेशा किसी न किसी बात को लेकर सरिता को ताने मारने लगी थी। लेकिन सरिता सब कुछ बर्दाश्त करती थी। यह सब देख कर कई बार राजीव ने भी सरिता से अपने साथ चलने के लिए कहा था। लेकिन सरिता हमेशा राजीव के साथ चलने से मना कर देती थी।
इसी बीच राम कुमार जी को पैरालिसिस का अटैक पड़ गया। राम कुमार जी का आधा शरीर सुन्न पड़ गया। अब वह ठीक से बोल नहीं पाते थे और आधा शरीर लकवाग्रस्त हो जाने के कारण उन्हें मोशन का पता नहीं चल पाता था या उन्हें अहसास तो होता था लेकिन वह बता नहीं पाते थे और सब कुछ बिस्तर पर हो जाता था जिससे राम कुमार जी के साथ साथ बिस्तर भी गंदा हो जाता था।
राजीव की मां तो पहले से ही बीमार और कमजोर थी उनसे तो राम कुमार जी को हिलाया नहीं जाता था। इसीलिए अब यह जिम्मेदारी भी सरिता के सिर आ गई। कोई और होता तो गंदगी से नाक मुंह सिकोड़ता लेकिन सरिता बिना किसी संकोच के राम कुमार जी की सेवा करती थी। उन्हें नहलाती और साफ सुथरा रखती थी। समय पर दवा देती थी और इनकी मालिश करती थी। उसकी यही सेवा भाव को देख कर राजीव की मां को अपनी गलती पर बहुत पछतावा होने लगा था।
एक दिन गुरु जी राम कुमार जी को देखने उनके घर गए। तब राजीव की मां सरिता की बहुत तारीफ करने लगी और अपनी गलतियां भी बताने लगी। मुझे लगने लगता था कि मेरी बहु मेरे बेटे को हमसे दूर कर रही है। इसी कारण मैं बहुत चिड़चिड़ी हो गई थी इसी कारण मैने न जाने अपनी बहु को क्या क्या कहा लेकिन उसने कभी पलट कर जवाब नहीं दिया। सरिता इतनी अच्छी है अपने ससुर की इतनी सेवा करती है अगर मेरी सगी बेटी होती तो भी अपने पिता की ऐसे सेवा न करती। मेरे पिछले जन्मों के पुण्य प्रताप है जो हमे ऐसी बहु मिली है। यह कहते कहते उनकी आंखों में आंसू आ गए।
तभी चाय लेकर सरिता कमरे में आ गई । जब गुरु जी ने कहा कि तुम्हारी सास तो तुम्हारी बहुत तारीफ कर है और कह रही है कि तुमने अपने ससुर की बहुत सेवा की है। फिर सरिता बोली ससुर और पिता में कोई अंतर नहीं होता है अगर मेरे पति यह होते तो यह सब काम वह करते अब वह हर समय यहां नहीं रह सकते तो उनका बेटे वाला फर्ज मैं पूरा कर रही हूं। इसीलिए मैने जो भी कुछ किया वो मेरा फर्ज है। मुझे तो बस इस बात का दुख है कि पापा की सेवा के कारण मेरा मंदिर जाना बिलकुल छूट गया है। कभी मौका मिला तो मंदिर जाकर भगवान से अपनी गलती के लिए माफी मांग लूंगी।
इस पर गुरु जी ने कहा बेटी तुम जो कर रही हो वह कई घंटों की पूजा से भी बढ़ कर है। इस पर सरिता ने कहा अंकल आप क्या कह रहे है। पूजा अलग है और सेवा अलग। सेवा से नहीं पूजा से भगवान प्रसन्न होते है । फिर गुरु जी ने कहा मेरी बात पर बिस्वास नहीं है तो भगवद गीता की बात तो मानोगी न। इस बात को भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कहा है।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।
अर्थात शारीरिक अभ्यास से श्रेष्ठ ज्ञान है, ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है और ध्यान से श्रेष्ठ कर्म फलों का परित्याग है और ऐसे त्याग से शीघ्र मन को शांति प्राप्त होती है।
और इसी बात को आचार्य चाणक्य ने भी अपनी पुस्तक चाणक्य नीति में इस तरह कहा है।
यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु ।
तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनैः ॥ १५-०१
अर्थात जिसका हृदय सभी जीवों पर दया से द्रवीभूत होता है, उसे ज्ञान, मोक्ष, जटाधारण और भस्मलेपन की क्या आवश्यकता है.
इन दोनों श्लोक के अनुसार अगर किसी व्यक्ति के मन में किसी दूसरे व्यक्ति को तकलीफ में देखने मात्र से ही उसके मन में दया और सेवा का भाव आता है। वह व्यक्ति निष्काम भाव से उस की सेवा करता है तो उसे कई घंटों के ध्यान और पूजा से ज्यादा शांति मिलती है। बेटी तुम्हारा यह निष्काम कर्म तुम्हे जीवन में सुख और शांति प्रदान करेगा। मेरा और तुम्हारे सास ससुर का आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है। इसके बाद चाय पीकर गुरु जी अपने घर वापस आ गए।
कुछ दिनों बाद सरिता की सेवा के कारण राम कुमार जी 80% तक ठीक हो गए । इसी बीच राजीव का तबादला लखनऊ में हो गया। राजीव के थोड़े प्रयास से उसे स्टाफ क्वॉटर्स भी अलॉट हो गया। जिस कारण अब वह सरिता से लखनऊ चलने की जिद करने लगा। इस पर सरिता ने साफ कह दिया कि सास ससुर को यहां अकेले छोड़ कर मैं कही नहीं जाऊंगी। सरिता की इस बात से राजीव भी बहुत खुश हुआ क्योंकि मन से तो वह भी यही चाहता था बस सरिता के मुंह से सुनना चाहता था। उसने मां और पिता को मनाया कि लखनऊ में बेहतर मेडिकल सुविधा है वहां पर पापा का अच्छी तरह से इलाज हो सकेगा। इस पर राजीव के माता और पिता ही लखनऊ में शिफ्ट होने की बात मान गए।
साथियों इसी के साथ आज की कहानी यही समाप्त होती है अगर कहानी अच्छी लगी हो तो वीडियो को शेयर कर भगवद गीता के प्रचार प्रसार में हमारा सहयोग कीजिए। राधे राधे
जय श्रीकृष्णा साथियों, आशा है आप सभी कुशल मंगल होंगे। इस चैनल पर हम प्राचीन पुस्तकों से मिलने वाले अमूल्य संदेश को सभी साथियों के साथ शेयर करते है। जिसे अपना कर हमारी जीवन यात्रा को सुगम और सुखमय हो सकेगी। इसी सीरीज में आज समझेंगे कि असली सुख क्या है और इसे कैसे प्राप्त कर सकते है तो आइए आज की वीडियो प्रारंभ करते है
आज गुरुजी अपने विद्यालय में कुछ काम रहे थे तभी विद्यालय के गेट पर करीब 5 से 6 लाल बत्ती वाली गाड़िया एक दम से रुकी , गुरु जी ने देखा कि एक कार से मंत्री जी उतरे है मंत्री जी विधायक जी के पुत्र है वहीं विधायक जी जिनकी कहानी कुछ समय पहले सुनाई थी।
गुरु जी को लगा कि मंत्री जी भी विद्यालय में छापा मारने आए है इसीलिए गुरुजी ने औपचारिक अभिवादन करने के बाद विद्यालय के डॉक्युमेंट्स उन्हें दिखाने लगे। मंत्री जी ने कहा गुरु जी आप यह क्या कर रहे है मैं विद्यालय में आपसे मिलने आया हूं। मंत्री जी अपना लेटेस्ट i phone टेबल पर रखते हुए बोले मैं आपके पास मदद मांगने आया हूं बहुत दिनों से मैं आपसे मिलने की कोशिश कर रहा था लेकिन समय ही नहीं मिल पा रहा था। आज लखनऊ से घर जा रहा था तभी अचानक विचार आया कि थोड़ा समय है आप से मुलाकात हो जाएगी। इसीलिए बिना बताए सीधे विद्यालय आ गया।
गुरु जी ने आश्चर्य से मंत्री जी की तरफ देखा और बोले मंत्री जी मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं। मंत्री जी बोले गुरु जी पिता जी आपकी बहुत तारीफ करते है जब से वह आपसे मिले है तब से वो पहले जैसे चिड़चिड़े भी नहीं रहते है मुझे भी कम डांट पड़ती है। उन्हीं को देख कर मेरा भी मन था कि आपकी मदद मांगने का हो रहा था। मंत्री जी आगे बोले गुरु जी आपको क्या बताना आप तो जानते ही है, मेरे पास भौतिक सुख सुविधा की कोई कमी नहीं है जो वस्तु किसी भी व्यक्ति को सुख प्रदान वह सब कुछ मेरे पास है या मेरे सामर्थ्य में है। फिर भी न जाने क्यों उनसे सुख नहीं मिल पा रहा है। आपके के कहने के बाद पिता जी ने भगवद गीता पढ़ना शुरू कर दिया है। उन्हीं को देखते हुए मैं भी भगवद गीता पढ़ने का प्रयास करता हूं कुछ समझ में आता है और कुछ नहीं। इसीलिए अब गुरु जी आप ही कुछ रास्ता बताइए। जिससे मन में सुख और जीवन में सुकून मिल सके।
गुरु जी ने मंत्री के पास दोनों गार्ड की तरफ देखा मंत्री जी समझ गए और दोनों गार्ड को बाहर जाने को कहा। पहले तो गार्ड ने मना किया लेकिन जब गुरु जी ने हंसते हुए कहा कि मेरे पास कोई हथियार नहीं है आप चेक कर सकते है। मुझे थोड़ी पर्सनल बात करनी है। इस पर गार्ड कुछ संकोच करते हुए बाहर चले गए।
फिर गुरु जी ने कहा यह बहुत अच्छी बात है कि आपने भगवद गीता पढ़ना शुरू कर दिया है भगवद गीता थोड़ी कठिन तो अवश्य है जल्दी समझ में नहीं आती लेकिन अगर एक बार समझ में आ जाए तो इसके अलावा कुछ भी पढ़ने का मन भी नहीं करेगा और न ही बचेगा। भगवद गीता ही जीवन का सार है। अब रही आपकी परेशानी तो आपके लिए भगवान श्री कृष्ण में भगवद गीता में कहा है
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।2.44।।
BG 2.44: सांसारिक सुखों में मन की गहन आसक्ति के साथ उनकी बुद्धि ऐसी वस्तुओं में मोहित रहती है इसलिए वे भगवद्प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के हेतु दृढ़-संकल्प लेने में असमर्थ होते हैं।
इसी बात को आचार्य चाणक्य ने अपनी पुस्तक चाणक्य नीति में भी कहा है।
बन्धाय विषयासङ्गो मुक्त्यै निर्विषयं मनः ।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ १३-१२
अर्थ:- यदि विषय बहुत प्रिय है तो वो बंधन में डालते है. विषय सुख की अनासक्ति से मुक्ति की और गति होती है. इसीलिए मुक्ति या बंधन का मूल मन ही है।
इन दोनों श्लोक के अनुसार ये सांसारिक वस्तुओं के प्रति लगाव हमे मोह में डालते है जिससे हमे दुख होता है। अगर हमें सूखी रहना है तो इन सांसारिक वस्तुओं से मोह त्यागना होगा।
गुरु जी इस श्लोक को मैने भी पढ़ा है लेकिन मुझे इसमें एक कन्फ्यूजन है मैं वर्तमान विधानसभा का यंगेस्ट मिनिस्टर हू। और मैं यंगेस्ट चीफ मिनिस्टर बनना चाहता हूं। क्या मुझे यंगेस्ट चीफ मिनिस्टर बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। इससे बेहतर है कि मैं साधु बन जाऊ। मंत्री जी ने थोड़ा तल्ख शब्दों में कहा।
इस पर गुरु जी ने कहा बिलकुल यही अंतर होता है भगवद पढ़ने और भगवद गीता के भाव को समझने का। मंत्री जी भगवद गीता में भगवान श्री ने कभी भी नहीं कहा कि हमे कोई इच्छा नहीं करनी चाहिए या कोई कर्म नहीं करना चाहिए। अगर दुनिया में सभी व्यक्ति कोई इच्छा नहीं करेंगे तो उसे पाने के लिए कर्म भी नहीं करेंगे। तो दुनिया कैसे चलेगी। यह संसार कर्म पर ही टिका है। कर्म तो साधुओं को भी करने पड़ते है।
भगवद गीता के अनुसार हमे इच्छाएं करनी है लेकिन इच्छाओं से लगाव नहीं करना है। इसे ऐसे समझ सकते है कि अगर हमारी कोई इच्छा पूरी न हो तो हमे दुख नहीं करना है और इच्छा पूरी हो जाए तो सुख भी नहीं करना है। हमे सिर्फ कर्म करना है और उससे मिलने वाले फल को भगवान को सौंप देना है। भगवद गीता हमे सिखाती है कि कैसे हमे नदी में तैरते हुए भी उससे भीगना नहीं है। संसार में रहते हुए इच्छाएं तो करनी है लेकिन इच्छाओं से लगाव नहीं करना है। कर्म तो करने है लेकिन कर्म फलों के माया जाल में नहीं फसना है। वस्तुओं का इस्तेमाल करते हुए भी उनसे लगाव या मोह नहीं रखना है। गीता ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद इंसान मोह के जाल में नहीं फंसता है।
जैसे आप यंगेस्ट चीफ मिनिस्टर बनना चाहते है यह तो बड़ी अच्छी बात है आपको इसके लिए प्रयास भी करने चाहिए यथा संभव कर्म भी करने चाहिए लेकिन दुर्भाग्य वश अगर आपको यह पद न मिले तो आपको इसका दुख नहीं करना चाहिए और यह पद मिल जाए तो भी ज्यादा खुश नहीं होना चाहिए। अपने आप को बिलकुल ऐसा बना लेना चाहिए जैसे कि सांसारिक वस्तुओं का सुख भोगते हुए भी सांसारिक वस्तुओं से लगाव न हो। भगवद गीता हमे सिखाती है कैसे संसार के उलझनों के बीच में रहते हुए भी हमें इन उलझनों में नहीं फसना है और हमेशा भगवान के दिखाए गए रास्ते पर चलना है।
मुझे इस बात की बहुत खुशी हुई कि आपने इतनी छोटी उम्र में ही भगवद गीता पढ़ना शुरू कर दिया। जिससे बहुत छोटी उम्र में ही आप जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझ सकेंगे। अब जाकर मंत्री जी को अपने प्रश्नों का उत्तर मिल गया। उनकी चेहरे पर संतुष्टि के भाव साफ साफ दिख रहे थे। मंत्री जी ने गुरु जी के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लिया और अपने घर की तरफ चल दिए।
साथियों इसी के साथ आज की कहानी यही समाप्त होती है अगर कहानी अच्छी लगी हो तो वीडियो को शेयर कर भगवद गीता के प्रचार प्रसार में हमारा सहयोग कीजिए। राधे राधे
जय श्री कृष्णा, साथियों, आशा है आप सभी साथी कुशल मंगल से होंगे। हम अपनी इस सीरीज में काल्पनिक कहानियों के माध्यम से भगवद गीता का मानव जीवन में क्या उपयोग है यह समझाने का प्रयास करते है। इससे कही न कही आप खुद को भगवद गीता से जोड़ पाएंगे। तो आइए आज की कहानी प्रारंभ करते है।
आज की कहानी है राज की
राज एक बीस साल का लड़का है और बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहा है। इंडिया में उसके पापा का बहुत अच्छा बिजनेस है। उसी को संभालने के लिए राज अमेरिका के एक विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय में बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहा था। एक दिन अचानक राज के पापा की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई और राज को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर पापा का बिजनेस संभालने इंडिया आना पड़ा।
बिजनेस संभालते ही राज को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। फैक्ट्री के वर्कर्स काम पर लेट आने लगे काम करने में लापरवाही करने लगे कुछ बोलो तो जवाब दे देते थे फिर राज ने थोड़ी सी कड़ाई दिखाई तो कुछ वर्कर्स काम छोड़ कर चले गए और कुछ वर्कर्स ने फैक्ट्री में स्ट्राइक भी कर दी। फैक्ट्री पूरा काम बंद हो गया।
अब राज बहुत परेशान हो गया उसने अपनी मां को फैक्ट्री की सारी बात बताई और कहा कि उसकी बिजनेस की पढ़ाई सब बेकार हो गई। इन वर्कर्स को न जाने क्या हो गया है मार्केट से ज्यादा सैलरी देता हूं उसके बाद भी कोई बात सुनता ही नही है। इस पर राज की मां ने कहा कि एक बार गुरु जी से बात करो वो तुम्हारे पापा के दोस्त थे और जब तुम्हारे पापा ने फैक्ट्री में काम शुरू किया था तब वो भी उनके साथ थे और बीच बीच में तुम्हारे पापा उन्हें फैक्ट्री ले जाते थे। तुम्हारे पापा ने बताया था कि गुरु जी उन्हें हमेशा अच्छी बातें बताते है।
राज ने गुरु जी को फोन लगाया और गुरु जी को सारी समस्या बताई और गुरु जी से जल्द मिलने की इच्छा जताई। इस पर गुरु जी ने कहा कि वह जल्द ही उससे मिलने आयेंगे। अगले सोमवार को सुबह करीब 10 बजे गुरु जी राज से मिलने उसके घर गए राज उस समय सो रहा था । जब उसे पता चला कि गुरु जी आए है तब वह हड़बड़ा कर उठा और फ्रेश होकर गुरु जी के पास गया और फैक्ट्री की समस्याएं गिनाने लगा। तब गुरु जी ने कहा तैयार हो जाओ हम फैक्ट्री में चल कर वही बात करेंगे इससे मुझे सिचुएशन समझने में आसानी होगी।
करीब 12 बजे राज और गुरु जी फैक्ट्री पहुंचे राज उन्हे ऑफिस में ले जाना चाहता था लेकिन गुरु जी ने कहा थोड़ा फैक्ट्री घूम लू। राज ने कहा अंकल मैं भी साथ चलूं तो गुरु जी ने उसे मना कर दिया कहा कि तुम परेशान न हो मैने पूरी फैक्ट्री पहले से ही देखी हुई है मैं और तुम्हारे पापा साथ में ही पूरी फैक्ट्री का राउंड लगाते थे। इस पर राज ने एक पुराने सिक्योरिटी ऑफिसर को गुरु जी के साथ भेज दिया।
गुरु जी फैक्ट्री में गए तो कई पुराने वर्कर्स मिल गए उनसे गुरु जी बात की हाल चाल लिया फिर गुरु जी स्ट्राइक करने वाले वर्कर्स से मिले अच्छी बात यह थी कि उनमें से ज्यादा तर वर्कर्स गुरु जी को जानते थे। गुरुजी ने हाल चाल लिया और स्ट्राइक करने का कारण पूछा। तब सबने अपनी समस्या गुरु जी को बताई। यह सब करते करते 2 बज गए और फैक्ट्री का लंच का टाइम हो गया।
गुरु जी ऑफिस में आकर राज के केबिन में चले गए। राज ने पूछा अंकल कुछ समझ में आया वर्कर्स ऐसा क्यों कर रहे है। इस पर गुरु जी ने कहा कि तुम्हारी इस समस्या का जवाब भगवद गीता के इस श्लोक में छुपा है अगर अमल कर सको तो बताऊं। राज को कुछ समझ में नहीं आया कहां फैक्ट्री और कहां हजारों साल पुरानी भगवद गीता। फिर भी राज ने गुरु जी का लिहाज करते हुए कहा ठीक है अंकल बताइए मैं जरूर उस पर अमल करूंगा। फिर गुरु जी ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कहा है
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
अर्थात श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करते हैं।
इस श्लोक के अनुसार आदर्श व्यक्ति जो काम करता है उससे संपर्क में आने वाला व्यक्ति भी वैसा ही आचरण करते हैं। वहीं समाज का लीडर होता है वह जो कुछ प्रमाणित कर देता है समस्त मनुष्य समुदाय उस का अनुसरण करने लगता हैं। इसका मतलब यह है कि राज हमारा समाज और इसमें बसने वाले लोग अपने लिए आदर्श ढूंढते हैं ऐसा आदर्श जब उन्हें मिल जाता है तब वह उसके गुणों को अपने व्यक्तित्व में उतारने लग जाते हैं इस तरह पूरा समाज एक आदर्श समाज बन जाता है। अगर इसको दूसरे अर्थ में समझे तो वह इस तरह होगा किसी से कुछ अपेक्षा रखने से पहले हमें वैसा आचरण खुद भी करना पड़ता है तभी हम अधिकार से दूसरों से अपेक्षा रख सकते हैं।
राज तुम्हारे लिए काम करने वाले लोग तुम्हे आदर्श की तरह मानते है। इसीलिए तुम्हें भी उनके लिए आदर्श बनना पड़ेगा जिस तरह तुम्हारे पापा उनके लिए आदर्श थे । वह हमेशा फैक्ट्री का समय शुरू होने से आधा घंटे पहले पहुंच जाते थे गेट पर खड़े होकर आने वाले लगभग सभी लोगो से मिलते थे उनके हाल-चाल पूछते थे अगर किसी को कोई समस्या हो तो उनकी मदद करने की कोशिश करते थे । काम के दौरान पूरी फैक्ट्री में घूमते रहते थे कि कहीं कोई दिक्कत तो नहीं। इस तरह से तुम्हारे पापा ने इन कर्मचारियों को बिल्कुल अपने परिवार की तरह बना लिया था इसी वजह से सभी लोग फैक्ट्री के काम को अपना काम समझ कर करते थे।
अब तुम बताओ राज क्या तुम ऐसा आदर्श प्रस्तुत कर रहे हो । राज को सारी समस्या समझ में आ गई। उसने गुरु जी को धन्यवाद दिया और प्रॉमिस किया कि वह भी अपने पापा की तरह सभी लोगो का आदर्श बन कर दिखाएगा।
कुछ महीने बाद राज की मां ने गुरु जी को फोन कर के बताया कि अब राज बिल्कुल बदल गया है पूरी मेहनत से फैक्ट्री का काम देख रहा है और उसकी फैक्ट्री भी पहले जैसे काम करने लगी है। उन्होंने आगे कहा कि इस दिवाली पर फैक्ट्री में पूजा रखी है जिसमे आप को जरूर आना है। इस पर गुरु जी ने भी सहमति जताई।
साथियों इसी के साथ आज की कहानी यही समाप्त होती है अगर कहानी अच्छी लगी हो तो वीडियो को शेयर कर भगवद गीता के प्रचार प्रसार में हमारा सहयोग कीजिए। राधे राधे
जय श्री कृष्णा, साथियों, आशा है आप सभी साथी कुशल मंगल से होंगे। हम अपनी इस सीरीज में काल्पनिक कहानियों के माध्यम से भगवद गीता का मानव जीवन में क्या उपयोग है यह समझाने का प्रयास करते है। इससे कही न कही आप खुद को भगवद गीता से जोड़ पाएंगे। तो आइए आज की कहानी सुरु करते है।
आज की कहानी है चंदन की,
आज चंदन की उम्र लगभग 19 वर्ष है और वह एक अच्छी कंपनी में काम कर रहा है। 18 वर्ष पहले जब चंदन 1 वर्ष का था उसके माता पिता अपने गांव से शहर आए थे। कुछ समय बाद चंदन के पिता जी ने एक फैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया और फैक्ट्री के पास में ही एक किराए का कमरा लेकर रहने लगे। गुरु जी का घर, चंदन के पिता का घर से ज्यादा दूर नहीं था इसीलिए गुरुजी चंदन के परिवार को अच्छी तरह जानते है। चंदन के पिता जी की एक बहुत गंदी आदत थी कि वह नशा करने के बाद अपनी पत्नी कमला को बहुत बुरी तरह मारते पीटते थे। लेकिन कमला चंदन के लिए सब बर्दास्त करती थी। समाज के लोगो ने चंदन के पिता को समझाया लेकिन सब कुछ बेकार।
कुछ दिनों बाद एक बहुत बुरी खबर आई कि नशे के हालत में चंदन के पिता जी की एक रोड ऐक्सिडेंट में मृत्यु हो गई। कमला का रो रो कर बहुत बुरा हाल हो गया था। उसे पति के जाने का दुख तो था लेकिन साथ ही साथ उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि अब उसका घर कैसे चलेगा और चंदन की पढ़ाई का क्या होगा। समाज के लोगो ने जब कमला का दर्द समझा तो फैक्ट्री के मालिक पर दबाव बनाया । फैक्ट्री के मालिक को कमला पर दया आ गई और कमला को उसी फैक्ट्री में नौकरी दे दी। सैलरी पति से कम थी लेकिन गुजर बसर के लिए पर्याप्त थी।
अब कमला जो कुछ कमाती थी उससे अपना घर चलाती थी और चंदन को पढ़ने के लिए स्कूल भेजती थी। समय के साथ चंदन की पढ़ाई भी पूरी हुई फिर उसकी शहर के बैंक में नौकरी भी लग गई नौकरी के कारण उसे ट्रेनिंग करने दिल्ली जाना पड़ा। करीब 6 महीने बाद उसने एक दिन मां को फोन किया कि अब उसकी ट्रेनिंग पूरी हो गई है । उसने कुछ पैसे बचाएं है जिससे वह अपनी मां का शहर के अच्छे अस्पताल में उसका इलाज करवाएगा।
अब जैसे लगा कि कमला के जीवन में सब कुछ अच्छा होने वाला है उसके सब दुख दूर हो जाएंगे। वैसे ही एक बहुत बुरी खबर आई। बीमारी की वजह से कमला की अचानक मृत्यु हो गई। चंदन का रो रो कर बहुत बुरा हाल था गुरु जी ने जैसे तैसे करके उससे कमला की अंतिम क्रिया की रस्म को पूरी किया। फिर सब लोग स्नान करने के लिए अपने अपने घर चले गए।
शाम को गुरु जी चंदन से मिलने उसके घर गए तो गुरु जी को देख कर चंदन फफक फफक कर रोने लगा जैसे छोटा बच्चा रोता है। फिर गुरु जी ने उसे शांत किया तो वह बोला कि यह भगवान का कैसा न्याय है मेरी मां ने कभी किसी के साथ बुरा नही किया फिर क्यों मेरी मां के जीवन में हमेशा दुख ही दुख लिखा था। चंदन का दुख देख कर गुरु जी चंदन को संभाला और कहा बेटा भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कहा है
न जायते म्रियते वा कदाचि
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।2.20।।
अर्थात यह शरीर न कभी जन्मता है और न कभी मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहने वाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
इस श्लोक के अनुसार तुम्हे अपनी मां के मरने का शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि उनका यह शरीर ही नष्ट हुआ है उनकी पवित्र आत्मा तो अजर अमर है आज उन्हे इस योनि से मुक्ति मिली है। क्योंकि उन्हें दूसरी योनि में जन्म लेना है। तुम्हारा और उनका साथ सिर्फ यही तक था
चंदन अब तुम्हारे प्रश्न के बात करते है भगवद गीता में भगवान श्री कृष्ण ने बताया है कि मनुष्य के कई जन्म होते है। उन जन्मों में किए गए कर्मों के अनुसार हमे अगले जन्म में सुख या दुख मिलता है। ये एक बैंक अकाउंट जैसे होता है। कमला दीदी के दुख उनके पिछले जन्मों के कर्मों के परिणाम रहा होगा। कमला दीदी का इस जन्म का कर्म बहुत अच्छा था संभवत उन्हें अपने अगले जन्म में सुख और शांति प्राप्त होगा । इसीलिए तुम व्यर्थ की चिंता न करो।
चंदन मुझे पता है कि तुम्हारी मां ने तुम्हारे लिए बहुत दुख बर्दास्त किए थे इसीलिए तुम अपनी मां का बहुत सम्मान करते थे उनके लिए बहुत कुछ करना चाहते थे। उन्होंने मुझे बताया था कि तुम उनका इलाज शहर के एक अच्छे अस्पताल में करना चाहते थे। तो तुम अपनी इच्छा को समाज के गरीब और लाचार लोगो का दुख दूर करके पूरी कर सकते हो। इससे तुम्हे संतुष्टि भी मिलेगी और कही न कही तुम्हारी मां की आत्मा को शांति मिलेगी।
इतना कहकर गुरुजी वहा से चल दिए कुछ समय बाद गुरु जी अपना रेगुलर चेकअप करवाने अस्पताल गए तो देखा कि वहा चंदन कुछ गरीब बूढ़ी महिलाओं का इलाज करवा रहा है। शायद इन बूढ़ी महिलाओं में चंदन को उसकी मां दिख रही होगी। यह सोच कर गुरु जी चंदन से बिना मिले डॉक्टर के केबिन में चले गए।
साथियों इसी के साथ आज की कहानी यही समाप्त होती है कहानी कैसी लगी कॉमेंट के माध्यम से जरूर बताइएगा। वीडियो को शेयर कर भगवद गीता के प्रचार प्रसार में भागीदार बनिए। धन्यवाद।