आपकों ऐसा लग रहा होगा कि चाणक्य के समयं की परिस्थिति अलग थी वर्तमान समय में लोक तंत्र है। चाणक्य के समय में राज तंत्र था उस समय राजा का पुत्र राजा बनता था जबकि वर्तमान समय में राज तंत्र समाप्त हो चुका है अब जनता , अपने बीच में से किसी व्यक्ति को अपना शासक चुनती है । इसीलिए चाणक्य की यह बातें अब किसी काम की नहीं है।
वैसे आपकी बात सही है अब राजा हम खुद चुनते है जो हमारी भलाई के लिए होता है लेकिन न जाने शासन वाली उस कुर्सी में कौन सा श्राप लगा है ज्यादातर जो लोग उस कुर्सी पर बैठते है सत्ता के नशे में चूर हो जाते है वह अपने आप को राजा से कम नहीं समझते उनमें बहुत अभिमान आ जाता है और वे निरंकुश होकर जनता पर अत्याचार करने लगते है।
ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि प्रजा अपने द्वारा चुने गए व्यक्ति को शासक के पद से हटा दे। और किसी अन्य योग्य व्यक्ति को अपना शासक चुने। यह सब बातें आचार्य चाणक्य ने चाणक्य नीति में लिखा है। इसीलिए आज के समय आचार्य चाणक्य की यह श्लोक बहुत ज्यादा प्रासंगिक हो गए है। चाणक्य नीति के माध्यम से राजा या शासक अपने कर्तव्य जान सकता है और जनता अपने अधिकार को समझ सकती है। और राजा और प्रजा मिल कर चाणक्य नीति के अनुरूप कार्य करके अपने समाज और देश की उन्नति कर सकतें है। वास्तव में दोनों एक दूसरे के पूरक है क्योंकि जैसा राजा होगा वैसा वैसी प्रजा होगी जैसा कि आचार्य कहते है
राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः ।
राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः ॥ १३-०८
अर्थ:- यदि राजा पुण्यात्मा है तो प्रजा भी वैसी ही होती है. यदि राजा पापी है तो प्रजा भी पापी. यदि वह सामान्य है तो प्रजा सामान्य. प्रजा के सामने राजा का उद्हारण होता है. और वो उसका अनुसरण करती है.
चाणक्य के अनुसार राजा और जनता के बीच पिता और पुत्र, भाई और भाई, दोस्त और दोस्त और समानता का व्यवहार होना चाहिए। प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा की भलाई में उसकी भलाई। अगर किसी संसाधन के अभाव में प्रजा या जनता कोई पाप कर देती है कानून को अपने हाथ में ले लेती है तो जनता द्वारा किए गए पाप राजा को लगते है जैसा कि आचार्य कहते है।
राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः ।
भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा ॥ ०६-१०
अर्थ:-राजा को उसके नागरिको के पाप लगते है. राजा के यहाँ काम करने वाले पुजारी को राजा के पाप लगते है. पति को पत्नी के पाप लगते है. गुरु को उसके शिष्यों के पाप लगते है.
इस तरह से आपने देखा कि राजा या शासक का पद बहुत सारी जिम्मेदारियों से भरा हुआ होता है इसीलिए राजा के बहुत से कर्तव्य होते है इन सभी कर्तव्यों को राजा अकेले पूरा करने में सक्षम नहीं होता है इसीलिए राजा को अपनी जिम्मेदारियों को योग्य लोगों के बीच में बाट देना चाहिए और इसके लिए राजा को योग्य और समाज के अच्छे लोगों का चयन करना चाहिए। समाज के अच्छे लोग विपत्ति के समय राजा का साथ छोड़ कर नहीं जाते है जैसा कि आचार्य कहते है
एतदर्थे कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति सङ्ग्रहम् ।
आदिमध्यावसानेषु न ते गच्छन्ति विक्रियाम् ॥ ०३-०५
अर्थ:- राजा लोग अपने आस पास अच्छे कुल के लोगो को इसलिए रखते है क्योंकि ऐसे लोग ना आरम्भ मे, ना बीच मे और ना ही अंत मे साथ छोड़कर जाते है.
इस तरह से राजा का बल उसकी सेना में उसके मंत्रियों में है। क्योंकि सिर्फ राजा के सोचने से कोई कार्य नहीं होगा जब तक मंत्री और सेना राजा का साथ नहीं देंगे। तब तक राजा कोई भी कार्य नहीं कर पाएगा इसीलिए आचार्य ने कहा है
बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा ।
बलं वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां पारिचर्यकम् ॥ ०२-१६
अर्थ:- एक ब्राह्मण का बल तेज और विद्या है, एक राजा का बल उसकी सेना मे है, एक वैश्य का बल उसकी दौलत मे है तथा एक शुद्र का बल उसकी सेवा परायणता मे है।
इस तरह से राजा अपने मंत्रियों को बिना बिलकुल असहाय हो जाता है और बिना अच्छे और योग्य मंत्रियों के राजा का राज्य नष्ट हों जाता है। जैसा कि आचार्य कहते है
नदीतीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनी ।
मन्त्रहीनाश्च राजानः शीघ्रं नश्यन्त्यसंशयम् ॥ ०२-१५
अर्थ:- नदी के किनारे वाले वृक्ष, दुसरे व्यक्ति के घर मे जाने अथवा रहने वाली स्त्री एवं बिना मंत्रियों का राजा - ये सब निश्चय ही शीघ्र नस्ट हो जाते हैं।
राजा को अपने राज्य को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि बेकार राज्य के राजा होने से बेहतर है कि राजा हो न रहे। जैसा कि आचार्य कहते है
वरं न राज्यं न कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम् ।
वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो वरं न दार न कुदरदारः ॥ ०६-१३
अर्थ:-एक बेकार राज्य का राजा होने से यह बेहतर है की व्यक्ति किसी राज्य का राजा ना हो. एक पापी का मित्र होने से बेहतर है की बिना मित्र का हो. एक मुर्ख का गुरु होने से बेहतर है की बिना शिष्य वाला हो. एक बुरीं पत्नी होने से बेहतर है की बिना पत्नी वाला हो.
बेकार राज्य का राजा होने से बेहतर है कि राजा ही न रहे क्योंकि बेकार राज्य में न राजा सुखी रह सकता है और न ही प्रजा जैसा कि आचार्य कहते है।
कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिर्वृतिः ।
कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कुशिष्यशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः ॥ ०६-१४
अर्थ:-एक बेकार राज्य में लोग सुखी कैसे हो? एक पापी से किसी शान्ति की प्राप्ति कैसे हो? एक बुरी पत्नी के साथ घर में कौनसा सुख प्राप्त हो सकता है. एक नालायक शिष्य को शिक्षा देकर कैसे कीर्ति प्राप्त हो?
जो राजा अपने राज्य का संचालन सही से न कर पाए । बड़े बड़े वादे करके चुनाव जीत ले लेकिन उन वादों को पूरा न कर पाए तो जनता को चाहिए कि ऐसे शासक को उसके पद से हटा दे। क्योंकि जो 5 सालों में अपने वादों को पूरा नहीं कर पाया तो इस बात की क्या गारंटी की वह भविष्य में अपने वादों को पूरा करे। जैसा कि आचार्य कहते है
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत् ।
खगा वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चाभ्यागतो गृहम् ॥ ०२-१७
अर्थ:- वेश्या को निर्धन व्यक्ति को त्याग देना चाहिए, प्रजा को पराजित राजा को त्याग देना चाहिए, पक्षियों को फलरहित वृक्ष त्याग देना चाहिए एवं अतिथियों को भोजन करने के पश्चात् मेजबान के घर से निकल देना चाहिए।
इसी तरह जो शासक अनैतिक है उसे अपने पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं ऐसे शासक को भी उसके पद से हटा देना चाहिए। जैसा कि आचार्य कहते है।
कान्तावियोगः स्वजनापमानं ऋणस्य शेषं कुनृपस्य सेवा ।
दारिद्र्यभावाद्विमुखं च मित्रं विनाग्निना पञ्च दहन्ति कायम् ॥ ०२-१४
अर्थ:- पत्नी का वियोग होना, आपने ही लोगो से बे-इजजत होना, बचा हुआ ऋण, दुष्ट राजा की सेवा करना, गरीबी एवं दरिद्रों की सभा - ये छह बातें शरीर को बिना अग्नि को ही जला देती हैं।
चाणक्य के अनुसार प्रजा को भी अपने सामर्थ्य का पता होना चाहिए कि वह सीधे सीधे राजा से मुकाबला नहीं कर सकता। वैसे तो आचार्य ने राजा से रूष्ट होकर भरी सभा में नन्द वंश को समाप्त करने की प्रतिज्ञा की थी और अपनी प्रतिज्ञा को पूरा भी किया। लेकिन सभी के लिए ऐसा करने से मना किया है।
साथियों इसी के साथ आज चर्चा यही समाप्त होती है वीडियो या चैनल के लिए कोई सलाह , सुझाव यहां तक कि कोई शिकायत भी हो तो भी कमेंट करे ताकि हम अपने वीडियो में सुधार कर सके। आपका एक एक कमेन्ट हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर वीडियो अच्छी लगी हो तो Like कर हमे प्रोत्साहित करे। वीडियो को शेयर करे ताकि अन्य लोग भी इस वीडियो का लाभ उठा सके। राधे राधे
- राजा को यह समझना चाहिए कि बलवान से युद्ध करना हाथियों से पैदल सेना को लड़ाने के समान है। हाथी और पैदल सेना का कोई मुकाबला नहीं हो सकता। उसमें पैदल सेना के ही कुचले जाने की आशंका रहती है। अत: युद्ध बराबरी वालों से ही करना चाहिए।...बलवान शत्रु के खिलाफ षड़यंत्र और संधी का सहारा लेना चाहिए।
- युद्ध के सही समय का इंतजार करना ही उचित है। इसके लिए पहले से रणनीति बनाना चाहिए। चाणक्य के खुद की एक टीम बनाकर बाद में भील, आदिवासी और वनवासियों को मिलाकर एक सेना तैयार की और सभी ने टीम बनकर कार्य किया और घननंद के शक्तिशाली साम्राज्य को उखाड़ फेंककर चंद्रगुप्त को मगथ का सम्राट बना दिया था। कोई भी व्यक्ति अकेला जरूर चलता है परंतु वह अकेला लक्ष्य तक पहुंच नहीं सकता। यह बात आप हमेशा ध्यान रखें कि आपकी सफलता सिर्फ आपकी सफलता नहीं होती है। इसमें कई लोगों का योगदान रहता है जिससे भूलना नहीं चाहिए।
- चाणक्य कहते हैं कि ऋण, शत्रु और रोग को समय रहते ही समाप्त कर देना चाहिए। जब तक शरीर स्वस्थ और आपके नियंत्रण में है, उस समय आत्म रक्षा और आत्म साक्षात्कार के लिए उपाय अवश्य ही कर लेना चाहिए, क्योंकि असुरक्षा में घिरने या मृत्यु के पश्चात कोई कुछ भी नहीं कर सकता।
- कूटनीति के 4 प्रमुख अस्त्र हैं जिनका प्रयोग राजा को समय और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करना चाहिए- साम, दाम, दंड और भेद। जब मित्रता दिखाने (साम) की आवश्यकता हो तो आकर्षक उपहार, आतिथ्य, समरसता और संबंध बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए जिससे दूसरे पक्ष में विश्वास पैदा हो। ताकत का इस्तेमाल, दुश्मन के घर में आग लगाने की योजना, उसकी सेना और अधिकारियों में फूट डालना, उसके करीबी रिश्तेदारों और उच्च पदों पर स्थित कुछ लोगों को प्रलोभन देकर अपनी ओर खींचना कूटनीति के अंग हैं।
- विदेश नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे राष्ट्र का हित सबसे ऊपर हो, देश शक्तिशाली हो, उसकी सीमाएं और साधन बढ़ें, शत्रु कमजोर हो और प्रजा की भलाई हो। ऐसी नीति के 6 प्रमुख अंग हैं- संधि (समझौता), समन्वय (मित्रता), द्वैदीभाव (दुहरी नीति), आसन (ठहराव), यान (युद्ध की तैयारी) एवं विग्रह (कूटनीतिक युद्ध)। युद्धभूमि में लड़ाई अंतिम स्थिति है जिसका निर्णय अपनी और शत्रु की शक्ति को तौलकर ही करनी चाहिए। देशहित में संधि तोड़ देना भी विदेश नीति का हिस्सा होता है।
समाने शोभते प्रीतिः राज्ञि सेवा च शोभते ।
वाणिज्यं व्यवहारेषु दिव्या स्त्री शोभते गृहे ॥ ०२-२०
samāne śobhate prītiḥ rājñi sevā ca śobhate ।
vāṇijyaṃ vyavahāreṣu divyā strī śobhate gṛhe ॥ 02-20
Meaning:- Friendship between equals flourishes, service under a king is respectable, it is good to be business-minded in public dealings, and a handsome lady is safe in her own home.
अर्थ:- प्रेम और मित्रता बराबर वालों में अच्छी लगती है, राजा के यहाँ नौकरी करने वाले को ही सम्मान मिलता है, व्यवसायों में वाणिज्य सबसे अच्छा है, अवं उत्तम गुणों वाली स्त्री अपने घर में सुरक्षित रहती है।
अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फलप्रदा ।
सेव्यतां मध्यभावेन राजा वह्निर्गुरुः स्त्रियः ॥ १४-११
अर्थ:- जो व्यक्ति राजा से, अग्नि से, धर्म गुरु से और स्त्री से बहुत परिचय बढ़ाता है वह विनाश को प्राप्त होता है. जो व्यक्ति इनसे पूर्ण रूप से अलिप्त रहता है, उसे अपना भला करने का कोई अवसर नहीं मिलता. इसलिए इनसे सुरक्षित अंतर रखकर सम्बन्ध रखना चाहिए.