जय श्री कृष्णा साथियों, आप सभी साथियों को कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ, भगवान श्री कृष्ण आपके जीवन यात्रा के मध्य में आए धर्म संकट को दूर करके आपकी जीवन यात्रा सुगम और सुखमय बनाये । जिस तरह से कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवद गीता का ज्ञान देकर अर्जुन के धर्म संकट को दूर किया था। आज भी इसी भगवद गीता का ज्ञान हमारी दुविधा को दूर करता है । आज की चर्चा में हम जानेंगे कि भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता के माध्यम से संपूर्ण मानवता को क्या संदेश दिया है और भगवद गीता हमारे लिए कितनी महत्व पूर्ण है तो आइए आज की चर्चा प्रारंभ करते है ।
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महाभारत के युद्ध में कुरुक्षेत्र मैदान में, अर्जुन जब अपने ही सगे-संबंधियों को देखकर भ्रम, दुख और मोह में फंस गए थे
वह युद्ध करने से पीछे हट गए और कहने लगे
“मैं अपने ही बंधु-बांधवों को मारकर कोई राज्य नहीं चाहता!”
तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें भगवद गीता का उपदेश दिया था —
जिसका उद्देश्य था: अर्जुन के मोह को तोड़ना और उसे कर्तव्य का बोध कराना ताकि वह धर्म के लिए युद्ध करे।
भगवद गीता का यह उपदेश सिर्फ अर्जुन के लिए ही नहीं था बल्कि
यह पूरी मानवता के लिए एक “जीवन-मार्गदर्शिका” है। जिसे जान कर पूरी मानवता को अपने कर्तव्य का बोध हो जाएगा । भगवद गीता का संदेश बहुत गहरा और जीवन को दिशा देने वाला है। यह केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि एक जीवन-दर्शन है, जो हर व्यक्ति के लिए उपयोगी है — चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या स्थिति में हो।
भगवद गीता में भगवान श्री कृष्ण सम्पूर्ण मानवता को बताते है कि जीवन में क्या सही है, क्या गलत है, कैसे अपने मन को नियंत्रित करें दुख, मोह, क्रोध, अहंकार से कैसे मुक्त हों? और अंततः ईश्वर तक कैसे पहुँचा जाए वेसे तो भगवद गीता इतनी महान पुस्तक है कि उसके सम्पूर्ण ज्ञान को किसी एक वीडियो में समेट पाना लगभग असंभव है फिर मैं भगवद गीता के कुछ सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान पर चर्चा करने का प्रयास कर रही हूँ
साथियों भगवद् गीता के अनुसार सभी को अपने अपने धर्म का पालन करना चाहिए भले ही वह धर्म दोष पूर्ण क्यों ना हो । भगवान कहते है
“श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।"
अर्थात् व्यक्ति को अपने स्वयं के धर्म का पालन करना, भले ही वह दोषपूर्ण हो, दूसरों के धर्म का अच्छी तरह से पालन करने से बेहतर है।
साथियो यहाँ धर्म का आशय वर्तमान हिंदू धर्म अथवा मुस्लिम धर्म से नहीं है । वास्तव में जब भगवान ने गीता का उपदेश दिया था उस समय दुनिया में कोई धर्म था ही नहीं । भगवान श्री कृष्ण के धर्म का आशय कर्तव्य से है जिसका सभी को पालन करना चाहिए ।
भगवान के धर्म को एक उदाहरण से समझते है जैसे यदि कोई सैनिक पांडव की सेना में है उसका धर्म अलग होगा और वही दूसरा सैनिक जो कौरव की सेना में है उसका धर्म अलग होगा । मान लीजिए कौरव की सेना वाले सैनिक को लगता है कि वह ग़लत लोगो का साथ दे रहा है फिर भी उसे अपना धर्म निभाना चाहिए । जिस तरह से दान वीर कर्ण ने यह पता होते हुए भी कि वह महाभारत के युद्ध में ग़लत व्यक्ति का साथ दे रहा है उसके बावजूद उसने अपना धर्म निभाया था । भगवद गीता के अनुसार अगर कभी भी हम धर्म संकट में फँस जाए तो हमे हमेशा अपने धर्म के अनुसार काम करना चाहिए ।
इस वीडियो में मैं धर्म के बारे में ज़्यादा बात नहीं करूँगी क्योंकि अगर मैंने धर्म के बारे में चर्चा करना सुरु कर दिया तब मैं अपने आज की चर्चा से भटक जाऊँगी । अगर आपको यह जानना हो कि शास्त्रों के अनुसार धर्म क्या है तो कमेंट कीजिएगा। मैं इस पर जरूर वीडियो बनाऊँगी ।
व्यक्ति को सदैव अपने कर्म पर ही ध्यान देना चाहिए फल की चिंता नहीं करनी चाहिए, भगवान कहते है
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थात् भगवान कहते है कि हे अर्जुन "तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। इसलिए कर्म को फल की इच्छा से मत करो, और न ही अकर्मण्यता में आसक्त हो।"
यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमें कर्म करते समय फल की इच्छा से मुक्त रहना चाहिए। हमें अपने कर्मों को बिना किसी आसक्ति के करना चाहिए, और परिणाम चाहे जो भी हो, हमें अपने कर्तव्य का पालन करते रहना चाहिए। जब हम फल की चिंता किए बिना कर्म करते हैं, तो हम तनाव और चिंता से मुक्त हो जाते हैं, और हम अपने काम में अधिक प्रभावी हो जाते हैं।
यह श्लोक हमें यह भी सिखाता है कि हमें अपने कर्मों के फल के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। हमें अपने कर्मों के फल के लिए खुद को जिम्मेदार ठहराना चाहिए, और हमें अपने कर्मों के परिणामों को स्वीकार करना सीखना चाहिए।
कर्म करते समय व्यक्ति को कभी चाहे जितनी भी मुश्किलें आए चाहे जितना भी सुख मिले उसे हमेशा एक समान बने रहना चाहिए जैसा कि भगवान ने कहा है
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
अर्थात् भगवान कहते है हे अर्जुन! सफलता और असफलता की आसक्ति को त्याग कर तुम दृढ़ता से अपने कर्तव्य का पालन करो। यही समभाव योग कहलाता है।
श्लोक के अनुसार समता का भाव हमें सभी परिस्थितियों को शांतिपूर्वक स्वीकार करने के योग्य बनाता है। सम का भाव इतना प्रशंसनीय है कि भगवान ने इसे 'योग' अर्थात् भगवान के साथ एक होना कहा है। जब हम यह जान जाते हैं कि प्रयास करना हमारे हाथ में है किंतु परिणाम सुनिश्चित करना हमारे नियंत्रण मे नहीं है तब हम केवल अपने कर्तव्यों के पालन की ओर ध्यान देते हैं। फलों की प्राप्ति भगवान के सुख के लिए है और हमें उन्हें भगवान को अर्पित करना चाहिए। अब ऐसी स्थिति में यदि हम यश और अपयश, सफलता और असफलता, सुख और दुःख दोनों को समान रूप से भगवान की इच्छा मानते हुए ग्रहण करना सीख लेते हैं तब हमारे भीतर ऐसा समभाव विकसित होता है जिसकी व्याख्या भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा की गयी है।
यह श्लोक जीवन की उथल-पुथल का अति व्यावहारिक समाधान है। यदि हम समुद्र में नौका चलाते हैं तब यह स्वाभाविक है कि समुद्र की लहरें नौका को हिला सकती हैं। यदि हम हर समय यह सोंचकर व्याकुल होते है कि लहरें नाव से टकरायेंगी तब हमारे दुःखों का कोई अंत नहीं होगा और यदि हम समुद्र में लहरें न उठने की अपेक्षा करते तब समुद्र की प्राकृतिक विशेषताओं में विरोध उत्पन्न होता है। लहरों का समुद्र से अविछिन्न सम्बंध है। उसी प्रकार से जब हम जीवन रूपी समुद्र को पार करते हैं तब हमारे सम्मुख लहरों के समान अनेक बाधाएँ आती हैं जो हमारे नियंत्रण से में नहीं होती हैं। उस समय हमे अपने आप नियंत्रण रखते हुए सम् भाव प्रकट करना चाहिए। यदि हम अपने मार्ग में आने वाली सभी कठिनाइयों का सामना करना सीख लेते हैं और उन्हें भगवान की इच्छा पर छोड़ देते हैं तब इसे ही वास्तविक 'योग' कहा जाएगा। जैसा कि भगवान ने कहा है
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽऽत्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अर्थात् मनुष्य को अपने आप को ऊपर उठाना चाहिए, अपने आप को नीचा नहीं गिराना चाहिए। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।
यह श्लोक के अनुसार मनुष्य के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उसकी अपनी आत्मा की होती है। मनुष्य का मन, उसकी सोच, उसकी भावनाएं - ये सभी उसके मित्र या शत्रु हो सकते हैं। यदि मनुष्य अपनी आत्मा को ऊपर उठाने के लिए प्रयास करता है, तो वह अपना मित्र बन जाता है और यदि वह अपनी आत्मा को नीचे गिरने देता है, तो वह अपना शत्रु बन जाता है।
यह श्लोक मनुष्य को अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराता है कि वह अपने जीवन के लिए स्वयं जिम्मेदार है। उसे अपने कर्मों, अपनी सोच, और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए ताकि वह अपने जीवन को बेहतर बना सके और हमे ईश्वर की प्राप्ति हो ।
आज कि चर्चा में हमने जाना कि
जब कभी भी हम धर्म संकट में फंसे तो हमे हमेशा अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए
हमे अपने कर्तव्य का पालन बिना किसी इच्छा बिना किसी आसक्ति के करना चाहिए
कर्तव्य पालन करते समय मार्ग में आने वाले सुख या दुख से विचलित नहीं होना चाहिए
व्यक्ति स्वम् अपना मित्र और शत्रु दोनों है क्योंकि व्यक्ति जैसा कर्म करेगा उसे वैसा ही फल मिलेगा
साथियों इसी के साथ आज चर्चा यही समाप्त होती है। एक बार फिर आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं। राधे राधे